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पुष्पेंद्र 'पुष्प' की ग़ज़लें

पुष्पेंद्र 'पुष्प' की ग़ज़लें

 
ख़्वाब किसी के अक्सर आँखों के रस्ते
नींद  उड़ा  ले  जाते  हैं  तन्हाई में

ग़ज़ल- एक 

गुलशन पर झुँझलाते हैं तन्हाई में
फूल  बहुत  शरमाते  हैं तन्हाई में
 
पेड़ उदासी ओढ़े रहते हैं लेकिन
पंछी  शोर  मचाते हैं  तन्हाई में
 
रोने वाले  आँसू  ज़ाया करते हैं
हम  तो  हँसते  गाते हैं तन्हाई में
 
गुमनामी में एक सुकूँ सा रहता है
शोहरत  से  घबराते हैं तन्हाई में
 
ख़्वाब किसी के अक्सर आँखों के रस्ते
नींद  उड़ा  ले  जाते  हैं  तन्हाई में
 
जीने के अंदाज़ सिखाने वाले भी
जीते जी  मर जाते हैं  तन्हाई में 

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ग़ज़ल- दो 
धीरे  धीरे  ही  सही, ग़म  के बहाने निकले
मेरी  आँखों  से  कई ख़्वाब  पुराने निकले
 
जितने भी  ग़म थे  मेरा साथ निभाने निकले
याद-ए-माज़ी को खँगाला तो खज़ाने निकले
 
झूठी उम्मीद के रस्ते पे चला हूँ ऐसे
जैसे सहरा में कोई उम्र बिताने निकले
 
मेरी आवाज़ पे आये ये ज़रूरी तो नहीं
चाँद छज्जे पे किसी और बहाने निकले
 
ज़िक्र जब उसकी वफ़ाओं का छिड़ा महफ़िल में
दिल के बटुए से कई नोट पुराने निकले
 
ऐसी उजलत में हैं अहबाब कि तौबा तौबा
जैसे सब नीम हथेली पे उगाने निकले
 
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ग़ज़ल- तीन 

कोई  मजबूत  शाना चाहता हूँ
मुहाजिर हूँ, ठिकाना चाहता हूँ
 
मेरी  आवारगी  थकने  लगी है
मैं ख़ुद में लौट आना चाहता हूँ
 
तुम्हीं  ने  होंठ सिल रक्खे हैं मेरे
तुम्हीं  को  गुनगुनाना  चाहता हूँ
 
मैं बनकर तीर आँखों की कमाँ का
तिरे  दिल  का  निशाना  चाहता हूँ
 
तुझे महसूस भी होगा किसी दिन
तुझे   मैं   वालिहाना   चाहता  हूँ
 
ख़ुदाया देख ली दुनिया तुम्हारी
कोई बेहतर ठिकाना चाहता हूँ
 
जहाँ इंसानियत के नक्श-ए-पा हों
उसी  रस्ते  पे  जाना  चाहता  हूँ
 
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ग़ज़ल- चार 
तन्हा डटे रहोगे तो लश्कर भी आएँगे
क़तरे का साथ देने समंदर भी आएँगे
 
बार-ए-फ़रेब रूह संभालेगी कब तलक
दिल के तमाम दर्द ज़बाँ पर भी आएँगे
 
ऐ शौक़-ए-दीद और ज़रा देर इन्तिज़ार
दर तक वो आ गए हैं तो अंदर भी आएँगे
 
बच्चों की परवरिश में ज़रूरी है ये ख़याल
कल को  वो तेरे क़द के  बराबर भी आएँगे
 
नेकी  की  रहगुज़र में  कई  ठोकरें  भी हैं
फल आए हैं शजर पे तो पत्थर भी आएँगे
 
तन्हाइयों  में  सिर्फ़  ख़याल  आएँगे  मगर
महफ़िल सजाओगे तो सुख़नवर भी आएँगे
 
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ग़ज़ल- पाँच 

थे ज़मीं पर, मगर  कहकशाँ  में रहे
उम्र भर सिर्फ़ वहम-ओ-गुमाँ में रहे
 
सबको अपने ही जैसी कहानी लगी
रंग    ऐसे    मेरी    दास्ताँ   में    रहे
 
मुझसे  मेरी  निभी  ही नहीं उम्र भर
लोग  कैसे   किसी   कारवाँ  में  रहे
 
ज़िन्दगी भर नताएज न आये मगर
हम क़दम दर क़दम इम्तिहाँ में रहे
 
चाह थी सुर्ख़-रू हम भी होंगे मगर
सिर्फ़  रुसवा  निगोड़े  जहाँ  में  रहे
 
याद जिसको ज़माना रखे पीढ़ियों
ऐसी   तासीर   मेरे   बयाँ   में  रहे

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1 Total Review

वसंत जमशेदपुरी

29 May 2025

बेहतरीन पेशकश

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रचनाकार परिचय

पुष्पेन्द्र 'पुष्प'

ईमेल : pushpendryadav870@gmail.com

निवास : जालौन (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 01/07/1981
जन्मस्थान- न्यामतपुर (जालौन)
शिक्षा- एम.ए. बी.एड.
(बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी)
संप्रति- अध्यापक (बेसिक शिक्षा परिषद, उ.प्र.)
प्रकाशन- ख़्वाहिशों के सिलसिले (ग़ज़ल-संग्रह) एवं देश भर से प्रकाशित विभिन्न स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
प्रसारण- आकाशवाणी और दूरदर्शन पर कविताएं प्रसारित।
सम्मान/पुरस्कार- कवितालोक सम्मान (हिसार 2015), छंद रत्नाकर सम्मान (प्रयागराज 2019), काव्य-गौरव सम्मान (औरैया 2019), निराला स्मृति सम्मान (रायबरेली 2020), हिंदी रत्न सम्मान (झाँसी 2021) इत्यादि अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
पता- सुशीलनगर, उरई, जनपद-जालौन (उ.प्र.)
मोबाइल- 8787205147