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प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की सत्रहवीं कड़ी

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की सत्रहवीं कड़ी

विवाह के बाद के इतने सालों में शिखा ने पहली बार समीर को इतने क्रोध में देखा। उनके बोलने से लग रहा था कि जल्द से जल्द बहू-बेटे घर से चले जाएँ।सार्थक के ऐसा क़दम उठाने से समीर बहुत आहत हुए थे।


समीर और शिखा को ऐसी कोई बड़ी स्वास्थ्य संबंधी व्याधि नहीं थी कि उन्हें किसी इमरजेंसी में अपने बेटे की ज़रूरत होती। पर अन्य माँ-बाप की तरह ही समीर और शिखा ने भी सार्थक से छोटी-छोटी अपेक्षाएँ पाल ली थीं। अगले दिन शाम को पाँच बजे दोनों की लखनऊ के लिए ट्रेन थी। शिखा ने सार्थक के जाने की सभी तैयारियों में उसकी व मीता की मदद की। उसका बहुत मन था कि अपनी बहू से कुछ बातें करे।

शिखा ने अपने बेटे सार्थक की शादी के लिए भी बहुत सारे ख़्वाब देखे थे। सभी रस्मों को बहुत अच्छे-से करवाकर वह अपनी बहू को घर लाना चाहती थी। पर जब अपने ही सिक्के में खोट हो तो कोई क्या कह सकता था! ऐसा नहीं था कि उसके मन में ये बातें इसलिए आ रही थीं कि सार्थक गोद लिया हुआ था बल्कि आज की नई पीढ़ी अपने माँ-बाबा से चोरी छिपे क्या नहीं करती! बस माँ-बाप के लिए उनकी हरकतों को स्वीकारना मुश्किल होता है। शिखा और समीर भी फिलहाल असमंजस की सी स्थिति में थे।

शिखा बहू से बात करने के मोह को छोड़ नहीं पा रही थी। उसका दिल बार-बार मचल रहा था। बहू के हाल-चाल पूछे, उसके परिवार व सभी के बारे में जाने मगर थोपे हुए रिश्तों में सहजता आने में समय लगता है। बहू कमरे से बाहर ज़्यादा नज़र आती तो ही वह बात कर सकती थी या बहू ख़ुद ही बात करना चाहती तो शायद उसे समय की कमी भी महसूस नहीं होती। फिर भी शिखा ने झिझकते हुए बहू के दिखने पर पूछा- "मीता! तुम और सार्थक बहुत कम दिनों के लिए आए हो बेटा! अपनी पसंद का खाना बताओ ताकि तुम्हें भी बना के खिला सकूँ। सार्थक का तो मुझे अच्छे-से पता है, वह क्या खाएगा। वही बनाया है मैंने। तुम भी बता दो तुम्हारे लिए भी बना दूँ। साथ ही ट्रेन में डिनर के लिए क्या लेकर जाओगे, यह भी बताना। अगले दिन सवेरे लखनऊ पहुँचोगे। ट्रेन लेट हो गई तो मुश्किल होगी। थोड़ी लड्डू और मठरी भी बना दी है। सवेरे चाय के साथ खा लेना।"

"ठीक है, आपने जो भी बना दिया है वही काफ़ी है। बहुत ज़्यादा मत बनाइए।" कुछ लापरवाही भरे अंदाज़ में अपनी बात बोलकर मीता कमरे में चली गयी।

बहू के बात करने के लहजे में सम्मान जैसा भाव नहीं था। अपनी पसंद का खाना बताए बग़ैर या फिर शिखा से पूछे बग़ैर कि उसे रसोई में कोई मदद चाहिए हो तो वह साथ में करवा दे। वह रसोई में ख़ुदके लिए कॉफी बनाने आयी थी और कॉफी बनाकर निकल गई। बस कॉफी बनाने के सामान का पूछा कहाँ-कहाँ रखा है। बाक़ी उसने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिसकी वजह से शिखा को उस पर कोई लाड़ उमड़ता।

शिखा ने पहले वापस आवाज़ लगाने का सोचा मगर फिर रुक गयी। न जाने क्यों मीता का व्यवहार देखकर शिखा को लगा कि मीता कोई बात नहीं करना चाहती। अगर वह बात करना चाहती तो रुककर कुछ भी बोलती। काम करवाने के लिए पूछना भी दोनों के बीच जुड़ाव की पहली कड़ी बाँधता। जबकि शिखा की नई बहू से काम करवाने की कोई मंशा नहीं थी।

उसने तो शिखा और समीर को माँ-पापा तक नहीं कहा। न ही वह दोनों के पास बैठने आयी। जबसे आई थी, अपने ही कमरे में थी। पर माँ का मन तो मन ही था। आहत होने पर भी कुछ कोशिशें कर लेना चाहता था। इतना सब होने के बाद भी शिखा ने सार्थक से कहा कि बहू को बोले हमारे साथ बैठने आये तब सार्थक ने कहा था- "माँ! मीता बहुत ज़्यादा मिक्स-अप नहीं होती। उसे जैसा ठीक लगे करने दो। बाद में जब आप दोनों से मिलेगी, अपने आप मिक्स-अप हो जाएगी।"
सार्थक की बात का शिखा के पास कोई जवाब नहीं था।

अगले दिन भी शिखा दोनों बच्चों के लिए सवेरे पाँच बजे से किचन में लगी थी। मीता नौ बजे अपनी और सार्थक की जब कॉफी बनाने आई तब उसने शिखा को काम करते हुए तो देखा पर वह चुपचाप अपनी और सार्थक की कॉफी बनाती रही। उसने यह तक नहीं पूछा कि वह उसके लिए या समीर के लिए कॉफी बनाए।

बेटा! पूरे डेढ़ साल बाद आया था वो भी बहू को लेकर। उसका तो लाड़ अपने आप ही उमड़ रहा था। शिखा तो मीता के थोड़ा-सा ही प्यार जताने से ही पिघल जाती। आदमी और औरत की प्रकृति में यही तो फर्क होता है। पर आज शिखा के सामने काम करते-करते पुनः-पुनः वही घटनाक्रम दौड़ने लगा, जब वह बच्चे के लिए तरसती थी। स्कूल में भी जब कई टीचर्स अपने बच्चों की बातें करतीं तो शिखा को ख़ुद का अकेलापन भरने के लिए बच्चे का ही विकल्प दिखता था पर समीर अपने विचारों से टस से मस नहीं होते थे।

आज शिखा को अपने उस सतही क्षणिक सुख को पाने की चाह बहुत खोखली महसूस हुई। बेटे की ज़िंदगी में माँ-पापा की क्या जगह है, वो उसे गुज़रे दिनों में नज़र आ गई थी।

बहू के घर आने पर जब शिखा ने समीर से उसे कुछ देने को कहा तो समीर ने यह कहकर कर साफ इंकार दिया- "दोगी तो उसे न, जब वो ख़ुद को इस घर की बहू माने। तुम्हारे पास कोई कुबेर का ख़जाना तो है नहीं, जो कभी ख़ाली नहीं होगा। कोई ज़रूरत नहीं अभी कुछ देने की। शिखा मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा ये अपना सामान यहाँ क्यों छोड़कर जा रहे हैं जबकि सार्थक ने हम दोनों की जगह उसके जीवन में कहाँ है, महसूस करवा दी है। बहू ने तो एक बार भी माँ या पापा कहकर संबोधित ही नहीं किया। हाँ, उसने सार्थक से यह ज़रूर कहा कि सामान इस घर में रख देते हैं। समझ सको तो उसकी मंशा समझने की कोशिश करो।"

विवाह के बाद के इतने सालों में शिखा ने पहली बार समीर को इतने क्रोध में देखा। उनके बोलने से लग रहा था कि जल्द से जल्द बहू-बेटे घर से चले जाएँ।सार्थक के ऐसा क़दम उठाने से समीर बहुत आहत हुए थे।

समीर ने हमेशा सार्थक के लिए जो बेस्ट था, वही किया। बहुत अच्छा स्कूल फिर कॉलेज। कहीं पर भी समझौता नहीं किया। उसके लिए हमेशा ब्रांडेड कपड़े ख़रीदे भले ही ख़ुद के लिए न लिए हो। वैसे भी समीर की आदत थी कि वह जो भी किसी के लिए करते, हमेशा अच्छे से अच्छा करने की कोशिश करते।

समीर दोनों को स्टेशन छोड़ने भी नहीं जाना चाहते थे पर जब शिखा ने उन्हें समझाया कि हमेशा के लिए बात हो जाएगी, चले जाओ। शिखा के बोलने से ही समीर गये। बेटे की हरकत की वजह से समीर और शिखा अपने ही घर में कुछ तनाव की सी स्थिति में आ गये थे। जब शाम की ट्रैन से दोनों चले गये तब समीर ने शिखा को बुलाकर कहा- "अब अच्छी-सी चाय बनाओ, दोनों शांति से बैठकर पीते है।” उम्र के साथ समीर में आये इस चेंज को देखकर शिखा हैरान थी। जो समीर बहुत कम बोलता था, अब उससे कुछ न कुछ साझा करने लगा था। प्रखर से मिलने के बाद समीर में आये इस सकारात्मक परिवर्तन के लिए शिखा काफ़ी ख़ुश थी। चाय पीते-पीते समीर ने शिखा को बुलाकर पास बैठाया और कहा- "शिखा! अब हम दोनों को बहुत कुछ सोचना होगा। अब तुम्हें भी महसूस हो रहा होगा कि सार्थक के व्यवहार में हमारे घर के संस्कार कहीं भी नहीं हैं। इस उम्र में हम उसे सुधार भी नहीं सकते। उसे अगर कुछ सीखना होता तो वो हमारे दिए संस्कारों से सीख जाता। अब तो अमल करने का वक़्त था।"

समीर की बातें सुनकर शिखा ने बीच में टोका- "इतना नकारात्मक क्यों सोच रहे हैं आप? क्या हो गया है आपको?"
"कुछ नहीं हुआ शिखा! सार्थक के इन दो दिनों के व्यवहार ने बहुत कुछ महसूस करवा दिया है। हम दोनों ने भी काफ़ी दुनिया देख ली है। ज़्यादा आशाएँ मत पालो। यह हम दोनों के लिए कुछ नहीं करेगा।" शिखा की ओर एक दृष्टि डालकर समीर ने आगे कहना शुरू किया- "शिखा! मुझे कुछ भी ठीक नहीं लग रहा है। सार्थक को हमने बहुत कुछ भावों से जुड़ा देना चाहा। इसके आने के बाद हमारी ज़िंदगियाँ बदल गयीं। घर चहकने लगा। पर आज जो सार्थक ने किया है, मुझे नहीं लगता कभी हमारी ज़रूरत में सार्थक साथ होगा।" शिखा चुपचाप समीर की बातें सुन रही थी। उसने बीच में समीर को टोका भी- "मत सोचिये बहुत ज़्यादा, जो लिखा होगा हम दोनों मिलकर सँभाल लेंगे।"

"क्या सँभाल लोगी मिलकर! मुझे तो आज महसूस हो रहा है कि मुझे किसी रोज़ कुछ हो गया तो! मुझे नहीं लगता यह तुम्हारा ख़याल रखेगा। अब सोच में पड़ गया हूँ। मुझे सार्थक से कोई उम्मीद नहीं। वैसे तो मेरे अपने भाई भी हैं पर सबकी अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ हैं।"
"अब आप ज़्यादा मत सोचिये। ऐसा कुछ भी नहीं होगा, आप ठीक रहेंगे। क्या हो गया है आज आपको! सब नकारात्मक ही सोच रहे हैं!"
"पढ़ी-लिखी होकर कैसी बातें कर रही हो शिखा! इंसान को किसी भी मोह में पड़कर अपने भविष्य की प्लानिंग करना नहीं छोड़ना चाहिए। उलटे मुँह खानी पड़ती है। समय संग चेत जाने से ही सब सध सकता है।"

थोड़ा रुक कर समीर ने अपने मन की बात शिखा के साथ साझा की- "शिखा हम लोगों तक की पीढ़ी में बहुत गुंजाइशें थीं। अब सहनशीलता और निभाने का स्तर बदल गया है। माँ-पापा होकर हमने उसको उच्च शिक्षा दी। आज वह बहुत समर्थ है। उसका भविष्य उसको ख़ूब तरक्की दे। आज की पीढ़ी आपके मरने के बाद मिलने वाली धरोहर के प्रति संवेदनशील नहीं होती। वो तुम्हारी या मेरी तरह माँ-बाऊजी के घर में अंतिम समय नहीं गुज़ारना चाहती। वो तो जितनी जल्दी होता है, उसको बेचकर स्ट्रेस फ्री होना चाहती है। उनके पास एक ही स्टैट्मन्ट होता है ‘किसके पास समय है बार-बार देखने जाने का।' हमारे बेटे सार्थक की तो स्थिति ही अलग है। उसका विश्लेषण जितना कम करें, उतना अच्छा है।

बहुत देर तक समीर की बातें सुनकर शिखा ने समीर से कहा- "अगर ऐसी कोई स्थिति आई भी तो मैं समर्थ हूँ समीर। अकेले भी रह सकती हूँ। अगर मैं पहले गई तो आपको दिक्कत होगी।" अपनी बात बोलकर शिखा काफ़ी देर तक चुपचाप लेटी रही। समीर भी बहुत देर तक कुछ सोचते रहे। कब नींद आई, पता ही नहीं चला।

जैसे-जैसे समय गुज़रा, समीर की शंकाएँ ही सच साबित हुईं। बेटे-बहू को जब भी छुट्टियाँ मिलतीं, घर आने की बजाय वो दोनों घूमने निकल जाते। जो फोन पहले हफ्ते-दस दिन में आते थे, वो महीने में आने लगे। बहू मीता ने कभी दोनों से चलाकर बात की हो, शिखा को याद नहीं आता। वह हमेशा नमस्ते करके फोन सार्थक को पकड़ा देती।

एक ओर तो प्रखर शिखा और समीर को अपने बेटे प्रणय को मिलवाने के लिए आतुर था। दूसरी ओर शिखा और समीर तो सार्थक को प्रखर से मिलवाने का भी सोच भी नहीं पाये। सच तो यह था कि इस बार सार्थक का व्यवहार शिखा और समीर को बहुत अपरिचित-सा लगा, जिसने बहुत कुछ सोचने के लिए दोनों को मज़बूर कर दिया।

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रचनाकार परिचय

प्रगति गुप्ता

ईमेल : pragatigupta.raj@gmail.com

निवास : जोधपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 23 सितंबर, 1966
जन्मस्थान- आगरा (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- एम०ए० (समाजशास्त्र, गोल्ड मैडलिस्ट)
सम्प्रति- लेखन व सोशल-मेडिकल क्षेत्र में काउंसिलिंग
प्रकाशन- तुम कहते तो, शब्दों से परे एवं सहेजे हुए अहसास (काव्य-संग्रह), मिलना मुझसे (ई-काव्य संग्रह), सुलझे..अनसुलझे!!! (प्रेरक संस्मरणात्मक लेख), माँ! तुम्हारे लिए (ई-लघु काव्य संग्रह), पूर्ण-विराम से पहले (उपन्यास), भेद (लघु उपन्यास), स्टेप्लड पर्चियाँ, कुछ यूँ हुआ उस रात (कहानी संग्रह), इन्द्रधनुष (बाल कथा संग्रह)
हंस, आजकल, वर्तमान साहित्य, भवंस नवनीत, वागर्थ, छत्तीसगढ़ मित्र, गगनांचल, मधुमती, साहित्य भारती, राजभाषा विस्तारिका, नई धारा, पाखी, अक्षरा, कथाबिम्ब, लमही, कथा-क्रम, निकट, अणुव्रत, समावर्तन, साहित्य-परिक्रमा, किस्सा, सरस्वती सुमन, राग भोपाली, हिन्दुस्तानी ज़ुबान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, नई दुनिया, दैनिक नवज्योति, पुरवाई, अभिनव इमरोज, हिन्दी जगत, पंकज, प्रेरणा, भारत दर्शन सहित देश-विदेश की लगभग 350 से अधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन और अनुवाद।
कविता अनवरत, कविता अभिराम, शब्दों का कारवां, समकालीन सृजन, सूर्य नगरी की रश्मियाँ, स्वप्नों की सेल्फ़ी, कथा दर्पण रत्न, छाया प्रतिछाया, सतरंगी बूंदें, संधि के पटल पर आदि साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
प्रसारण-
जयपुर दूरदर्शन से चर्चा व आकाशवाणी से सृजन का नियमित प्रसारण
सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में कविता का स्थान विषय पर टी.वी. पर एकल साक्षात्कार
संपादन- अनुभूतियाँ प्रेम की (संपादित काव्य संकलन)
विशेष-
राजस्थान सिन्धी अकादमी द्वारा कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' का अनुवाद।
कहानियों और कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' पर शोध।
प्रतिष्ठित कथा प्रधान साहित्यिक पत्रिका 'कथाबिम्ब' के संपादक मण्डल में क्षेत्रवार संपादक
कहानियों व कविताओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद
हस्ताक्षर वेब पत्रिका के लिए दो वर्ष तक नियमित 'ज़रा सोचिए' स्तंभ
सम्मान/पुरस्कार-
हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश (भोपाल) द्वारा 'तुम कहते तो' काव्य संग्रह पर 'श्री वासुदेव प्रसाद खरे स्मृति पुरस्कार' (2018)
'अदबी उड़ान काव्य साहित्य पुरस्कार' काव्य संग्रह तुम कहते तो और शब्दों से परे पुरस्कृत व सम्मानित (2018)
साहित्य समर्था द्वारा आयोजित अखिल भारतीय 'डॉ० कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता' श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार (2019 और 2020)
विद्योत्तमा फाउंडेशन, नाशिक द्वारा 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' कहानी संग्रह 'विद्योत्तमा साहित्य सम्राट सम्मान' से पुरस्कृत (2021)
श्री कमल चंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार 2021
कथा समवेत पत्रिका द्वारा आयोजित 'माँ धनपति देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान' 2021, विशेष सम्मान व पुरस्कार
लघु उपन्यास भेद पुरस्कृत मातृभारती 2020
विश्व हिंदी साहित्य परिषद द्वारा 'साहित्य सारंग' से सम्मानित (2018)
अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में 'समाज रत्न' से सम्मानित (2018)
डॉ० प्रतिमा अस्थाना साहित्य सम्मान, आगरा (2022)
कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा राज्य स्तरीय सम्मान 'रघुनंदन त्रिवेदी कथा सम्मान' स्टेपल्ड पर्चियांँ संग्रह को- 2023
पंडित जवाहरलाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी, राजस्थान द्वारा 'इंद्रधनुष' बाल कथा संग्रह को 'बाल साहित्य सृजक' सम्मान 2023 
जयपुर साहित्य संगीति द्वारा 'कुछ यूँ हुआ उस रात' को विशिष्ट श्रेष्ठ कृति सम्मान 2023
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