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कानपुर का नवजागरण (भाग- दस)- पं० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी

कानपुर का नवजागरण (भाग- दस)- पं० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी

सन् 1921 में "प्रताप" ने रायबरेली के ताल्लुकेदार सरदार वीरपाल सिंह के अत्याचारों का विवरण, शर्मा जी के इस शीर्षक के साथ छपा था,क्या सूबे मे आग लगाने का इरादा है?"

गणेश जी को सज़ा 

सन् 1921 में "प्रताप" ने रायबरेली के ताल्लुकेदार सरदार वीरपाल सिंह के अत्याचारों का विवरण, शर्मा जी के इस शीर्षक के साथ छपा था,क्या सूबे मे आग लगाने का इरादा है?" वीरपाल सिंह ने मानहानि का मुकदमा चलाया और सज़ा हुई गणेश जी को। "प्रताप" और लाला सालिगराम बजाज का बड़ा घनिष्ठ संबंध रहा है। जब कभी प्रताप पर या गणेश जी पर आँच आती तो लाला जी ने उसकी सहायता के लिए अथक परिश्रम किया। लाला सालिगराम ने कानपुर कांग्रेस की बड़ी सेवा की है। यद्यपि वे कभी खादीधारी नहीं बने। अपने विलायती वस्त्रों की दुकान उन्होंने बन्द कर दी। इन दिनों प्रताप साहित्यकारों का अच्छा जमघट था। प० श्रीकृष्णदत्त पालीवाल इस समय1921 से 1923 उसके संपादक थे। प० विष्णुदत्त शुक्ल, प० बालकृष्ण शर्मा प्रताप व प्रभा के संपादक रहे। प० माखनलाल चतुर्वेदी प्रभा के ही संपादक थे। प० श्री राम शर्मा, श्री दशरथ प्रसाद द्विवेदी, प० देवव्रत शास्त्री, श्री जगमोहन विकसित, प० बलभद्र प्रसाद मिश्र, श्री जनार्दन भट्ट आदि प्रताप के संपादकीय विभाग मे रहे। प० रमाशंकर अवस्थी जी पहले प्रताप के सम्पादन विभाग में थे और फिर सन् १९२२ मे उन्होंने "दैनिक वर्तमान" स्वतंत्र रूप से निकाला। प० माखनलाल चतुर्वेदी (एक भारतीय आत्मा) त्रिशूल, नवीन तथा भगवतीचरण वर्मा कानपुर में अपने कार्यों द्वारा नगर में नवचेतना ला रहे थे, तो दूसरी ओर और हिन्दी काव्य की फड़कती भाषा नया परिधान और विस्तृत राष्ट्रधर्म का पाठ भी पढ़ा रहे थे। इन्हीं कवियों में प० माखनलाल चतुर्वेदी, नवीन भगवतीचरण वर्मा ने नई विधा में लिखकर छायावाद को जन्म कानपुर में दिया था। मूर्त से अमूर्त की ओर जाना ही छायावाद है और राष्ट्र प्रेम भी अमूर्त भावना है। उसको सरल सरस भावना में व्यक्त करना भी छायावाद है। वास्तविक छायावाद के उन्नायक और जन्मदाता ये कानपुरी है न कि प्रसाद, निराला, पन्त आदि।
सन् 1923 में प्रो० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी और भगवतीचरण वर्मा ने मिलकर क्राइस्टचर्च कॉलेज की 'हिन्दी साहित्य परिषद' की स्थापना की और कानपुर में प्रथम विशाल कवि सम्मेलन 'सनेही' जी की अध्यक्षता में इस समिति की अवधानता में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इसी वर्ष श्री हीरालाल खन्ना,प० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी, श्री गणेशशंकर विद्यार्थी, श्री नारायणप्रसाद अरोड़ा, प० उदयनारायण बाजपेयी, प० सदगुरुशरण अवस्थी, ठाकुर जयदेव सिंह, श्री कृष्ण विनायक फड़के, बाबू देवीप्रसाद खत्री आदि के सहयोग से कानपुर नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। इन सब तत्वों ने मिलकर कानपुर में बौद्धिक नवचेतना के पुनर्जागरण को साकार रूप दिया।

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रचनाकार परिचय

पण्डित लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी

ईमेल :

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

पण्डित अम्बिकाप्रसाद त्रिपाठी के पुत्र पण्डित लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी जी का जन्म 20 अक्टूबर 1898 को कुन्दौली, कानपुर में हुआ था। सन् 1918 में क्राइस्टचर्च कालेज कानपुर से बी.ए.करने के बाद लक्ष्मीकान्त जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. इतिहास विषय मे उत्तीर्ण कर अध्यापन कार्य मे संलग्न हो गये। कानपुर के क्राइस्टचर्च कालेज मे दीर्घअवधि तक अध्यापन व इतिहास विभाग के अध्यक्ष पद पर रहे और एक वर्ष कान्यकुब्ज कालेज के प्रधानाचार्य भी रहे। आपके शोध निबंध सरस्वती, प्रभा, सुधा, माधुरी, प्रताप ,वर्तमान और दैनिक जागरण मे प्रकाशित होते रहते थे। आपने पटकापुर मे अपना निवास बनाया और यहीं पर सन १९४६ ई० बाबू नारायणप्रसाद अरोड़ा व श्याम विजय पाण्डेय के साथ मिलकर कानपुर इतिहास समिति का गठन किया जिसके अध्यक्ष बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा व मंत्री आप बने। उसी वर्ष 1946 में आपने अपने भाई रमाकान्त त्रिपाठी के साथ मिलकर "कानपुर के कवि" और सन 1947 में कानपुर के प्रसिद्ध पुरुष  व 1948 में कानपुर के विद्रोही पुस्तक बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा व श्याम विजय पाण्डेय के साथ मिलकर लिखी व प्रकाशित कराई थी। सन 1950 में कानपुर का इतिहास भाग-1 व 1958 में कानपुर का इतिहास भाग-2  बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा के साथ मिलकर लिखी व प्रकाशित कराई थी। राय देवीप्रसाद पूर्ण की कविताओं का संकलन व सम्पादन "पूर्ण संग्रह" के नाम से किया जो गंगा पुस्तकमाला, लखनऊ से प्रकाशित हुआ था। 
    आपके दत्तक पुत्र डा.अनिल मिश्र (बब्बू)  डी. ए. वी. कालेज मे इतिहास के प्रोफेसर रहे। आपका निधन कठेरुआ मे वर्ष १९८१ मे हुआ। आप स्थानीय इतिहास के साथ साथ साहित्य संस्कृति राजनीति धर्म व समसामयिक विषयों पर निरन्तर लिखते रहते थे। आपका पटकापुर कानपुर का पाठागार बहुत ही समृद्ध था ।