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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

ब्रजकिशोर वर्मा 'शैदी' की गोविन्द गुलशन की स्मृतियों को समर्पि नज़्म 'आज हर आँख है नम'

ब्रजकिशोर वर्मा 'शैदी' की गोविन्द गुलशन की स्मृतियों को समर्पि नज़्म 'आज हर आँख है नम'

लौट पाएगी भला क्या वो आबो-ताब कभी,
सानिहा मौत का बनकर सवाल आया है।
क्यों न ग़मगीन हो मालाजी इस अज़ीयत पर?
रौनके-बारादरी पर ज़‌वाल आया है।।

आज हर आँख है नम, दिल भी हर इक है ग़मगीं,
आज हर शख्स़ के दिल में पिन्हाँ अज़ीयत है।
जिसकी सोहबत से हुए फैज़याब हम बरसों,
पेश उस शख्स़ को नज़रान-ए-अकीदत है।

वक़्त का कैसा सितम, साले-नौ के आते ही,
यकबयक पड़ गया गुलशन पे खिजां का साया।
टाल सकता है भला कौन लिखा किस्मत का!
उस कयामत का न अंदाज़ा कोई कर पाया।

बारहा पहले भी नासाज़ थे, पर ठीक हुए,
ज़ीस्त उन पर थी फ़िदा, पर नहीं बोली उनसे।
बारहा छू के उन्हें, दूर चली जाती थी,
खेलती मौत रही आँख-मिचोली उनसे।

ज़िंदगी ख़ूब गुज़ारी थी ग़ज़ल की मानिंद,
इब्तिदा बन गयी हस्ती की सूरते-मतला।
वक़्त की पड़ गयी कुछ यूँ निगहे-बद आख़िर,
साले-नौ बन गया पुरसोज़ ग़ज़ल का मक़्ता।।

साद‌गी उनकी, खुलूस उनका, तबस्सुम् उनका,
शख्सियत को नये उन्वान अता करते थे।
अक्से-इंसां में फरिश्ता ही नज़र आता है,
देखकर उनको, यही लोग कहा करते थे।।

सर पे क्या ख़ूब फ़बन थी सियाह टोपी की,
साद‌गी में भी शहंशाही झलक मिलती थी।
शेरवानी को वो जिस वक़्त पहन लेते थे,
शख्सियत उनकी गुले-तर की तरह खिलती थी।।

दर हक़ीक़त थी यगाना ही शख्सियत उनकी,
ज़िस्म ठिंगना था, प’ हस्ती में वो क़दआवर था।
लोग अक्सर जिसे आलातरीन कहते हैं,
हर नज़रिये से उसी सोच के बराबर था।।

एक मख्सूस से लहजे में तरन्नुम की सदा,
गूँजती जब भी थी 'बारादरी' के गुबंद से।
बंद-सा तारी हुआ यकबयक सरे-महफिल,
वाहवाही की सदा आई दिल की सरहद से।।

वो थे हर रोज़ लिखा करते नई एक ग़ज़ल,
हर सुबह जैसे रंगोली को सजाए कोई।
या कि मंदिर में किसी देवता के चरणों में,
आरती जैसे कि हर रोज़ ही गाये कोई।।

थी ग़ज़ल आपकी जागीर, आपकी हस्ती,
हर घड़ी आप 'ग़ज़ल' में ही रहा करते थे।
मो'तबर उतनी थी कुछ आपकी ये शख्सियत,
लोग ताज़ीम से उस्ताद कहा करते थे।।

सिर्फ शायर न थे, उस्तादे-शायरी भी रहे,
क़ाबिले-दाद हमेशा थे आपके तेवर।
भूल सकती भला कैसे ये ग़ज़ब माला जी*,
एक अदना को बना डाला आपने 'गौहर'।।

लौट पाएगी भला क्या वो आबो-ताब कभी,
सानिहा मौत का बनकर सवाल आया है।
क्यों न ग़मगीन हो मालाजी इस अज़ीयत पर?
रौनके-बारादरी पर ज़‌वाल आया है।।

एक मख्सूस से लहजे में तरन्नुम की सदा,
गूँजती जब भी थी 'बारादरी' के गुबंद से।
बंद-सा तारी हुआ यकबयक सरे-महफिल,
वाहवाही की सदा आई दिल की सरहद से।।

जब भी होते थे वो मसनदनशीन महफिल में,
उनके चेहरे से न हट पायीं किसी की आँखें।
सबने देखा उन्हें ऐसी निगाहे-उल्फ़त से,
रह गयीं उनके ही नज़दीक सभी की आँखें।।

आश्कारा थी यकीनन ही अहलियत उनकी,
दायरा उन‌की लियाकत का यगाना-ओ-ग़ज़ब।
आलमे-शेरो-अदब पे न क्यों हो उनकी जिया?
'नूर' के नूर से पुरनूर हुआ उनका अदब।।

आपने खूब लिखे गीत, ग़ज़ल, दोहे, नज़्म,
अल्पनाएँ कोई काग़ज़ में ज्यों सजाई हैं।
पढ़ते ही ज़ेह्न में ख़ुशबू महकने लगती है,
जैसे मंदिर में अगर‌बतियाँ जलाई हैं।।

गीत हो या कि ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, दोहे,
कौन-सा छंद है, जिसको कि नहीं साधा था।
'नूर' का फैज़ कि 'बेचैन' की शागिर्दी हो,
नाम. गुरुओं का हो रोशन, यही इरादा था।।

मुतालिआ करें जब आपके कलाम का हम,
एक-एक लफ़्ज़ महकता लगे मआनी से।
ख़ुशबुएँ तैरने लगतीं जेहन में लफ्ज़ों की,
हुस्न लहराता है जज़्बात की रवानी से।।

साफ़ आता है नज़र, कैसा है अंदाजे-सुखन,
लफ्ज़-दर-लफ़्ज़ अदब का ही एक हिस्सा है।
जो भी तहरीर हुआ नोके-कलम से उनके,
दिल पे जो गुज़री है, उसका ही कोई किस्सा है।।

शायरी के है, अयां जिसमें हो शायर का मिज़ाज,
लब भी अशआर के मफ़हूम खोलने लग जाएँ।
सिर्फ अल्फ़ाज़ की तरतीब ही नहीं काफ़ी,
बात तो तब है कि अल्फ़ाज़ बोलने लग जाएँ।।

नस्र हो, नज़्म हो, अंदाज़े-बयां हो कि अदब,
सब में अहसास बुलंदी पे नज़र आता है।
दौरे-हाज़िर के चुनिंदा अदबनवाज़ों में,
पेशतर सबके ही नाम उनका लिया जाता है।।

थी रविश आपकी, कुछ सबसे जुदा औरों से,
जिससे कुछ और अदब में थी बढ़ी शाने-ग़ज़ल।
इसकी तस्दीक हर इक बज्मे-अदब में भी हुई,
जिसकी बाइस ही यक़ीनन हे सुल्ताने-ग़ज़ल।।

अपने घर में ही नहीं, गैर मुमालिक में भी,
सामईन आपको, भरपूर दाद देते थे।
आपको आता था वो लफ़्ज़ बरतने का शऊर,
एक मिसरे में ही महफ़िल को लूट लेते थे।।

उंसिय्यत उनकी अदब से थी किस कदर वाजेह,
उनके तहज़ीबो-तमद्‌दून की बात कौन कहे?
शख्सियत से ही था मंसूब उनके घर का पता,
के शहंशाहे-ग़ज़ल थे, सो ग़ज़ल में ही रहे।

है यकीं, होगा न कम सिलसिला-ए-शेरो-अदब,
नस्ले- फ़र्दा को गये सौंप अदबीयत की खू।
चाहे मिस्मार खिज़ाओं ने किया गुलशन को,
अहले-गुलशन को मयस्सर है अभी भी 'ख़ुशबू'*।।

आज मशकूर हैं शेरो-सुख़न के दीवाने,
उनके ही दौर में हाज़िर थे जनाबे-गुलशन।
सिर्फ अप‌ना ही नहीं, अपने अदब के बल पर,
ग़ाज़ियाबाद का भी नाम कर दिया रोशन।।

जब सजे-महफिले-शेरो-अदब तो लाज़िम हो,
उनकी तस्वीरे-मुबारक सजी हो मसनद पर।
फ़र्ज़ अब इतना तो हम पर भी आज आयद है,
हो शुरू उनकी ग़ज़ल से ही शायरी का सफ़र।।

पेश नज़रान-ए-तहसीनो-अकीदत उनको,
दौरे- हाज़िर के हसीं आला सुख़नवर को सलाम।
जिसने महकाया सलीके से अदब का गुलशन,
उस करिश्माई बाद‌शाह के हुनर को सलाम।।

बाअदब मेए, अदब के बुलंद सर को सलाम।

 

* डॉ० माला कपूर 'गौहर'
* उनकी पुत्री

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रचनाकार परिचय

ब्रज किशोर वर्मा 'शैदी

ईमेल :

निवास : sahibabad

परिचय

ब्रज किशोर वर्मा 'शैदी'

शिक्षा

: 3 जून, 1941, अलीगढ़ (उ.प्र.) बी.लिब.एससी., एम.एससी. (गणित), एम. फिल.

भाषा ज्ञान

: हिन्दी, अग्रेजी, उर्दू ब्रजभाषा, रशियन, सर्बियन व क्रोएशियन

प्रकाशित पुस्तकें :

 

  1. कृत्आत-संग्रह

: 'मयखाना' (डॉ. हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' के छंद में) प्रकाशन वर्ष 1963,

 

  1. मसनवी

 

: 'नागफनी का गुलदस्ता' (काव्यात्मक प्रेमकथा), (दो संस्करण)

 

3-5. गजल-संग्रह

 

: 'चुगली खाये रोशनदान', 'प्यास का दरिया', 'घर सरहद पर'

 

  1. हज़ल-संग्रह

 

: 'जूते बदल गये' (मजाहिया गजलें)

 

7-10. नज़्म-संग्रह

 

: 'तजिबाते-इश्क', 'दर-दर की ठोकरें', 'खुशबुओं के साये', 'अंदाजे-बयाँ और'

 

  1. समवेत संग्रह

 

: 'तिराहे पर खड़ा दरख़्त' (दोहा-गजल-नज़्म संग्रह)

 

12-14. दोहा-संग्रह

 

: 'हम जंगल के फूल', 'संध्या मले गुलाल', 'मन हो गया कबीर'

 

15-16. गीत संग्रह

 

: 'मोरपंखी स्वर हमारे', 'इन्द्रधनुषी दौर अपने',

 

  1. भक्ति-काव्य

 

: 'आस्था के फूल'

 

  1. ब्रज भाषा काव्य

 

: 'ब्रज माधुरी'

 

19-22. हास्य-व्यंग्य

 

: 'तुकी बेतुकी', 'तू-तू, मैं-मैं', 'जूते बदल गये' 'साली जी'

 

  1. विविधा

 

: "दिवसांजलि"

 

  1. बालगीत

 

: 'चूहे की शादी'

 

  1. शोध-ग्रंथ

 

: 'युगोस्लाव भाषाओं में भारत संबंधी रचनाएं व अनुवाद'

 

  1. अनुवाद

 

: 'क्रोएशियन साहित्य' (क्रोएशियन रचनाओं का हिन्दी अनुवाद) क्रोएशियन दूतावास, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित । 'क्रोएशियन बाल गीत के अनुवाद' ('आजकल' में प्रकाशित) ।

 

  1. संस्मरण

 

: 'वर्मा खानदान के सौ वर्ष'

 

  1. यात्रा संस्मरण

 

: यूरोप प्रवास, अमेरिका, सिंगापुर, नेपाल, दुबई, शारजाह, आबूधाबी, अंडमान, श्रीनगर, मनाली व कुरुक्षेत्र भ्रमण के संस्मरण विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित ।

 

भूमिका

 

: 'समुंदर हद में रहता है' (गजल-संग्रह-कवि : देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'), 'परवाज' (गजल संग्रह, कवि : सतीश कौशिक), 'मौन की बाँसुरी' (गजल-संग्रह, कवयित्री : तारा गुप्ता), श्रीरामचरितमानस (उर्दू तर्जुमा) : रामचन्द्र वर्मा 'साहिल'

 

समीक्षा व आलेख

 

: दोहा, गीत व गजल पर आलेख तथा इन विधाओं के संग्रहों की समीक्षाएँ अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित ।

 

संपादित संग्रहों में सहभागिता :

 

(क) दोहे

 

: 'सप्तपदी' खंड-1 (सं. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'), 'समकालीन दोहे (सं. इसाक अश्क), 'समकालीन दोहा कोश' 2014 (सं. हरेराम 'समीप')

 

(ख) गज़लें

 

: 'गजलांजलि' (सं. रामगोपाल 'परदेसी'), गजल दुष्यंत के बाद खंड-1 (सं. दीक्षित दनकौरी), 'सात आवाजें, सात रंग' (सं. ओमप्रकाश चतुर्वेदी)

(ग) अशआर

 

(घ) नज़्म

 

: 'कवियों की शाइरी' (सं. शेरजंग गर्ग)

 

: 'वसंत का अग्रदूत' (सं. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'), 'इदं इंद्राय' (सं. योगेन्द्र दत्त शर्मा व अन्य), 'गूँज' (सं. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' व अन्य), 'राग और पराग' (सं. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' व अन्य)।

 

विदेश यात्राएँ

 

: नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, ब्रिटेन, लग्जमबर्ग, बेल्जियम, फ्रांस, हॉलैंड, जर्मनी, स्विटजरलैण्ड, इटली, स्पेन, मोनैको, सर्बिया, क्रोएशिया, स्लोवेनिया, ऑस्ट्रिया, पौलैंड, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी, अमेरिका, सिंगापुर, नेपाल, दुबई, शारजाह व आबूधाबी।

 

सम्मान

 

  1. भारत विकास परिषद, साहिबाबाद द्वारा प्रदत्त साहित्य गौरव सम्मान-2017।

 

  1. 'खुशदिलाने-जोधपुर' साहित्यिक संस्था द्वारा प्रदत्त 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड-2019

 

  1. 80वें वर्ष में प्रवेश करने पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ 'शैदी' 'परत-दर-परत'

 

सम्प्रति

 

: पटेल चैस्ट इंस्टीट्यूट, दिल्ली विश्वविद्यालय से ऐसोसिएट प्रोफेसर के समकक्ष पद से सेवानिवृत्ति के उपरांत समाज सेवा व काव्य-सृजन में व्यस्त ।

 

सम्पर्क : बी. के. वर्मा 'शैदी'

 

11/108, राजेन्द्र नगर, साहिबाबाद, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)

 

दूरभाष : 9871437552