Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

डॉ० नवीन दवे मनावत की कविताएँ

डॉ० नवीन दवे मनावत की कविताएँ

क्यों छीनकर हम मजबूरन
प्रेम को आमंत्रित करते हैं?
यह आलिंगन, चुंबन, रति
नहीं है देह की चाह
केवल और केवल है
प्रेम का निर्जीव निर्माण
जो प्रेम का प्राण नहीं, प्रयाण है
जिस पर हँसती हर युग की एक निश्छल पीड़ा। 

मन का फैलाव सीमित है

मैंने पेड़ों से पुछा
तुम्हारी जाति और धर्म क्या है?
उन्होंने कहा- परोपकार
मैंने नदियों से संवाद किया
तुम्हारे समाज का विस्तार कहाँ तक है?
उन्होंने कहा- जहाँ जीवन है
मैंने पहाड़ों को दहाड़ लगाई
तुम्हारा धरती पर भार कितना है?
वे बोले- आदमी से हल्का रहेगा आजन्म

मैंने आकाश को निर्निमेष देखा
कि तुम्हारा फैलाव कितना है?
उसने कहा- जहाँ नदियों और पहाड़ों का संवाद है

मैंने आदमी से कहा-
धर्म, जाति, परोपकार, फैलाव की
परिभाषाएँ बताओ!
उसने कहा- रक्तपात, भिन्नता, स्वार्थ, संकीर्णता, ईर्ष्या-द्वेष
मैंने कहा- प्रकृति और आदमी की
परिभाषा अलग-अलग क्यों है?
मेरा अंतर्मन बोला-
मन का फैलाव सीमित हैं।
और सीमित में असीमित द्वन्द्व!


**********

 

प्रेम का निर्जीव निर्माण

उनकी देह किसी पत्थर या धातु से निर्मित नहीं थी
उनकी देह पर किसी भी तरह के दाग़ नहीं थे
देह वही थी, जिसको होती है एक अकल्पनीय पीड़ा
उसके आँसुओ के हिस्से अनगिनत थे
वे थी अमर निशानी
काल क्रुर सभ्यता की
जो केवल मानवीय संवेदनाओं को गटक गई थी

उनका होना ही एक सभ्यता और संस्कृति का प्रज्वलित होना था
ताकि धैर्य का कुल गौरव जीवित रहे
उनका होना ही होना था राजनीतिक प्रयोजन
उनका होना ही एक इतिहास का पन्ना था

देह की चाह और अहंकार सिद्धि
व्यवस्था का निर्माण नहीं थे
और न आज का निर्माण हैं
यह आत्मिक प्रश्र है मेरा कि
देह इतनी जल्दी लाचार क्यूँ है?

प्रेम को अभिव्यक्त करना और छीनना
दोनों कितने अलग-अलग विषय हैं
अभिव्यक्त करने में हृदय को बच्चों जैसा होना पड़ता है
और छीनना एक युग का अंत
जो इतिहास कभी क्षमा नहीं करता
क्षमा नहीं करता आगामी पीढ़ी का निश्छल प्रेमी

क्यों छीनकर हम मजबूरन
प्रेम को आमंत्रित करते हैं?
यह आलिंगन, चुंबन, रति
नहीं हैं देह की चाह
केवल और केवल है
प्रेम का निर्जीव निर्माण
जो प्रेम का प्राण नहीं, प्रयाण है
जिस पर हँसती हर युग की एक निश्छल पीड़ा। 


**********


काग़ज़ का दर्द

काग़ज़ हर समय निर्दोष रहा
उसने सच को सच लिखना स्वीकारा
झूठ को झूठ, रोने को रोना
हँसने को हँसना
मतलब कि काग़ज़ जब-जब बोला
समय को तोला

क़लम जो भी अपराध करती
काग़ज़ उसे सहर्ष स्वीकारता
सृष्टि की दृष्टि काग़ज़ को दोषी मानती है
पर मैं नहीं, मैं कवि हूँ 
यह बात काग़ज़ नहीं जानता
जानता है केवल
एक ही बात कि जो तुम लिखो
आदमी के हक़ में लिखो

काग़ज़ और धरती
दोनों में समानता देखता हूँ 
उपर्युक्त दोनों पाठकों का विचार प्रश्र है
परंतु मेरा निष्कर्ष पूर्ण हो गया

काग़ज़ का दर्द
एक ऐसा दर्द है जैसा कवि का
कवि सहता है पीड़ा को
पीड़ा उकेरी जाती है काग़ज़ पर
यह करतब देखती है आजन्म क़लम
जो चलती है काग़ज़ पर
गोदती है अंतर्मन।

3 Total Review
K

Kuldeep singh bhati

17 October 2025

बहुत शानदार कविताएँ। हार्दिक बधाई आपको

N

NAVIN dave

17 October 2025

कविताएं प्रकाशित करने के लिए संपादक मंडल का आत्मीय आभार

मास्टर भूताराम जाखल

17 October 2025

बेहतरीन काव्य प्रस्तुतियां आदरणीय नवीन जी सा

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

नवीन दवे मनावत

ईमेल : navinkumarmanawat@gmail.com

निवास : सांचोर (राजस्थान)

जन्मस्थान- सांचोर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० (हिंदी एवं संस्कृत), बी० एड, यूजीसी नेट, पीएच०डी
संप्रति- स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य
प्रकाशन- काव्य संग्रह 'शब्द जब बन जाता है आईना' बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित। वागर्थ, मधुमती, सरस्वती, ककसाड़, नवल, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर आदि देश की प्रतिष्ठित सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन।
पता- कैलाश नगर, सांचोर ज़िला- जालोर (राजस्थान)- 343041
मोबाइल- 9414792013