Ira Web Patrika
जनवरी 2026 के अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

सृजना का 'यात्रा अनवरत-4' कार्यक्रम सम्पन्न

सृजना का 'यात्रा अनवरत-4' कार्यक्रम सम्पन्न

डाॅ० हरीदास व्यास ने अपने प्रथम कहानी संग्रह 'तिनकों का ताप' से प्रारम्भ करते हुए बाद में प्रकाशित संग्रह- 'एक था पेड़' व 'कहानी है कि ख़त्म नहीं होती' की कहानियों, आलोचना-पुस्तक 'आलोचना की अन्तर्ध्वनियों' के हवाले से बताया कि शब्द संयोजन जीवन के विभिन्न स्तर पर बदलता रहता है।

"सम्पूर्ण सृष्टि कहानी का ही एक ऐसा कोलाज है, जिसमें हर चीज़ अपना कोना रखती है, हर अफ़साने में एक कहानी होती है लेकिन हर कहानी में अफ़साना नहीं होता। कहानी कहने के लिये शैली और प्रवाह के साथ उसमें दिलचस्पी और उत्सुकता का होना अनिवार्य है। लेखक द्वारा कहानी लिखे जाने के बाद कहानी पाठक की है, अब उसका अर्थ पाठक निकालेगा कि उसने क्या समझा है ना कि लेखक क्या समझाना चाहता है। कहानी किसी ज़ंजीर के बीच की कोई कड़ी है, जो बीच ही से शुरू होती है और बीच में ही ख़त्म हो जाती है। लेकिन ज़ंजीर उससे पहले भी है और बाद में भी।" ये उद्गार ख्यातनाम शायर-चिन्तक पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम ने नेहरू पार्क स्थित डाॅ० मदन सावित्री डागा साहित्य भवन में कला, संस्कृति, शिक्षा विमर्श मंच सृजना द्वारा वरिष्ठ कथाकार एवं आलोचक डाॅ० हरीदास व्यास की साहित्यिक यात्रा पर आयोजित 'यात्रा अनवरत' शृंखला कार्यक्रम के चतुर्थ अंक के संवाद का समाहार करते हुए व्यक्त किये।

संस्था की अध्यक्ष सुषमा चौहान ने बताया कि डॉ० हरीदास व्यास के रचना-कर्म पर साक्षात्कार का प्रारम्भ करते हुए वरिष्ठ कथाकार हरिप्रकाश राठी ने कहानी की भाषा को समुन्नत करने, प्रथम कहानी संग्रह के साथ प्रारम्भ यात्रा, सामाजिक सरोकार जैसे विषयों पर सृजन सम्बन्धी प्रश्नों की शृंखला निष्पादित की। डाॅ० हरीदास व्यास ने अपने प्रथम कहानी संग्रह 'तिनकों का ताप' से प्रारम्भ करते हुए बाद में प्रकाशित संग्रह- 'एक था पेड़' व 'कहानी है कि ख़त्म नहीं होती' की कहानियों, आलोचना-पुस्तक 'आलोचना की अन्तर्ध्वनियों' के हवाले से बताया कि शब्द संयोजन जीवन के विभिन्न स्तर पर बदलता रहता है। बचपन में सुनी कहानियाँ स्मृति में रहकर शब्द-सम्पदा बढ़ाती हैं, भाषा का रूप गढ़ती हैं। बाज़ार के जादू से बचे रहने वाला व्यक्ति जीवन में अपनी सम्वेदनाओं, अनुभूतियों का भी संतुलन बना पाता है लेकिन अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने की लालसा ख़ुद उसे स्तब्ध कर देती है। कहानी के विषय में कई किरदारों को रचते हुए महसूस किया कि प्रेम में डूबे व्यक्तियों, पनपती महत्त्वाकांक्षाओं को समय की कसौटी पर परखते हुए यह भी पाया कि प्रेम बलिदान माँगता है। सब-कुछ फ़ना कर देने का नाम प्रेम है।

कथाकार, रंगकर्मी और पत्रकार अयोध्या प्रसाद गौड़ ने साहित्य के साथ पत्रकारिता और फिर आलोचना के साथ-साथ सोशल मीडिया विषय पर प्रश्न पूछे। उत्तर देते हुए डॉ० व्यास ने बताया कि 1975 से वर्षों तक साहित्य और पत्रकारिता साथ-साथ चलते रहे। लेखक अपनी रचना का पहला आलोचक भी होता है। वर्तमान दौर में सोशल मीडिया भी रचना की आलोचना के साथ भाषा को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। गौड़ ने सोशल मीडिया की निरन्तरता, आलोचक के रूप में सृजन और स्वभाव, लेखक की रचनाशीलता से सम्बंधित उद्वेलित करने वाले प्रश्न किये। जिसके जवाब में डाॅ० हरीदास व्यास ने अपने सफ़रनामे में बताया कि 1975 में शौकिया समाचार लेखन करते हुए भाषा की कसावट सीखकर पहला फीचर सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी पर लिखा। उसी के समानांतर कविता लिखना भी प्रारम्भ हुआ। प्रेम विषय पर अपने चिर-परिचित अंदाज़ में बताया कि प्रेम की टूटन एक बेहतर इंसान की रचना करती है, प्रेम में टूटकर विरेचन हो जाने से बनी प्रतिबद्धता जीवन को सकारात्मकता की ओर ले जाती है। इस अवसर पर उन्होंने अपनी पहली कविता 'नाराज़ न होओ चिदम्बरा' भी सुनाई।

कहानी लेखन पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि अपनी कहानी का पहला आलोचक लेखक स्वयं ही होता है। पर सृजन तभी तक सम्भव है, जब तक लेखक के मन में बसा एक मासूम बच्चा जीवित रहे। जब आलोचक हावी हो जाता है तो रचनात्मक लेखन छूट जाने का ख़तरा हो जाता है। आलोचना के बने-बनाए प्रतिमान लेखक पर हावी न होकर समानान्तर ही चलने चाहिए। सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रिया कभी रचनात्मक नहीं हो सकती। किसी लेखक की किसी एक रचना पर लेखक के बारे में कोई राय बनाना बेमानी होता है। सोशल मीडिया पर अक्सर किसी एक टिप्पणी के आधार पर राय बना दी जाती है। इस अवसर पर डाॅ० व्यास ने अपने प्रेरणा स्रोत के रूप में आचार्य लक्ष्मीकान्त जोशी को याद करते हुए प्रारम्भिक दौर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जनवादी लेखक संघ और प्रजलेस की स्थापना से सम्बंधित अपने संस्मरण भी सुनाए।

अपनी रचना प्रक्रिया बताते हुए डॉ० व्यास ने कहा कि उनके लिए कहानी लेखन नीम चाँदनी रात में किसी वीरान पड़ी इमारत में दीवारें टटोलते हुए आगे बढ़ने के समान होता है। ऐसी हर यात्रा मुझे रोमांचित करती है। मेरी कहानी यथार्थ को अनुभव से टटोलने का प्रयास है। डॉ० व्यास ने आधुनिक कहानी के इस दौर में पानू खोलिया, मणि मधुकर, उदयप्रकाश, संजीव, रघुनंदन त्रिवेदी, जितेंद्र भाटिया, प्रियम्वद, हबीब कैफ़ी, योगेंद्र दवे, हसन जमाल आदि को महत्त्वपूर्ण कथाकार कहा।

'यात्रा-अनवरत' के अगले दौर में डाॅ० इश्राक़ुल इस्लाम माहिर, सन्तोष कुमार, डाॅ० शालिनी, डॉ० राजेन्द्र सिंह राठौड़, मीठेश निर्मोही, राकेश मेहता सहित अनेक अतिथियों ने डॉ० व्यास से उनकी रचनाओं की सामाजिकता, कहानियों के शीर्षक, पात्रों के नाम, कहानी के ट्रीटमेंट, कहानियों के प्रवाह, कहानी लेखन की विषय-विविधता, रचना के शिल्प, विषय-चयन, कहानी रचने को प्रेरित करने वाली घटना या किसी समाचार से सम्बंधित कहानी से सम्बंधित अनेक प्रश्नोत्तर करते हुए अपनी जिज्ञासाएँ भी अभिव्यक्त कीं। 'सृजना' के बैनर तले पूर्व में 'यात्रा-अनवरत' की इस शृंखला में सुषमा चौहान, शीन काफ़ निज़ाम और हबीब कैफ़ी की साहित्यिक यात्रा पर आयोजन किये जा चुके हैं। इस अवसर डॉ० कौशलनाथ उपाध्याय, हबीब कैफ़ी, डॉ० पद्मजा शर्मा, राकेश मूथा, डाॅ० कालूराम परिहार, डाॅ० मनीषा डागा, बी० के० व्यास, एन० डी० निम्बावत, बृजेश अम्बर, नफासत अहमद, डॉ० नीना छिब्बर, डॉ० कविता डागा, डाॅ० रेणुका श्रीवास्तव, डाॅ० सूरज माहेश्वरी, सत्येंद्र छिब्बर, रामकिशोर फिड़ोदा, बसन्ती पंवार, दीप्ति कुलश्रेष्ठ, चान्दकौर जोशी, कमलेश तिवारी, प्रमोद वैष्णव, हरीश देवनानी, मोहित कुलश्रेष्ठ, मोहन सिंह रतनू, डाॅ० फतेहसिंह भाटी, डॉ० दशरथ सोलंकी, डॉ० नितिन, मनशाह नायक, संजीदा खानम, महावीर सिंह खुर्शीद, डॉ० वसुमती शर्मा, डॉ० विनोद गहलोत, एम० एस० ज़ई, मुकेश माण्डण, गिरधारी लाल विश्वकर्मा, सुरभि खींची, दीपिका मोयल सहित अनेक साहित्यकार, कला-प्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन कहानीकार प्रगति गुप्ता ने किया तथा अध्यक्ष सुषमा चौहान ने आभार व्यक्त किया।

0 Total Review

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

टीम इरा वेब पत्रिका

ईमेल : irawebmag24@gmail.com

निवास : कानपुर (उत्तरप्रदेश)