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जनवरी 2026 के अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

विकास की ग़ज़लें

विकास की ग़ज़लें

विकास की ग़ज़लें अपने समय की तल्ख़ अभिव्यक्ति है। वे पूरी ग़ज़लीयत के साथ, बड़े सलीक़े से हमारे दौर के ज़रूरी विषय अपनी ग़ज़लों में पिरोते हैं। इनकी ग़ज़लों के आईने में सियासत, समाज और उस समाज का आम आदमी, सभी अपना अक्स बहुत साफ़-साफ़ देख सकते हैं। इनके पास बेबाक कहन है और उतने ही बेबाक विषय उठाने की हिम्मत भी। बहुत सादगी और संजीदगी के साथ ग़ज़ल में विकास साधनारत हैं। मज़बूत कथ्य के साथ-साथ इनकी ग़ज़लों की अपनी ज़मीनें तथा उनके रदीफ़ भी सम्मोहित करते हैं।

- के० पी० अनमोल

ग़ज़ल- 01

प्यार-जज़्बात सियासत न समझ पाएगी
दिल के हालात सियासत न समझ पाएगी

भूख ऐसी है हमें जीने नहीं देती है
भूख की ज़ात सियासत न समझ पाएगी

लड़कियों की यहाँ हर बार उछाली इज़्ज़त
कोई बारात सियासत न समझ पाएगी

बात उनसे तो नज़र से ही हुआ करती है
ये मुलाक़ात सियासत न समझ पाएगी

आप फुटपाथ पे सोते हैं, उसे क्या लेना
आपकी रात सियासत न समझ पाएगी

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ग़ज़ल- 02

एक लड़की गोद में बच्ची लिए मज़बूर है
घर संभाले या पढ़ाई, मांग में सिन्दूर है

आजकल संसद भवन में कौन जाता है भला!
राजपथ पर है मदारी, नाचता लंगूर है

कार-बंगले और कपड़े अनगिनत हासिल हुए
माँ-पिता का प्यार लेकिन आज उससे दूर है

हारकर मैं लौट जाऊँ आपने कैसे कहा
जानता हूँ थक गया हूँ, हाँफना मंज़ूर है

आप तो सिगरेट पीते कुर्सियों पर बैठकर
भूख जिसको लग रही है वो कोई मज़दूर है

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ग़ज़ल- 03

सफ़र तू यार ऐसा रख, कहानी में मज़ा आए
क़दम हर बार ऐसा रख, कहानी में मज़ा आए

ज़मीं से आसमां तक प्यार का ही अब नज़ारा हो
दिलों में प्यार ऐसा रख, कहानी में मज़ा आए

बहुत ही बोर होता हूँ सिनेमा घर में जाकर मैं
कोई किरदार ऐसा रख, कहानी में मज़ा आए

न छोटा हो, बड़ा कोई, अमीरी क्या, ग़रीबी क्या
यहाँ बाज़ार ऐसा रख, कहानी में मज़ा आए

वो ज़िंदा भी रहे लेकिन न जीने की तमन्ना हो
ज़रा-सा वार ऐसा रख, कहानी में मज़ा आए

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ग़ज़ल- 04

अभी चुनाव है, होगी ज़ुबान शर्मिंदा
रहीम-राम पे देंगे बयान शर्मिंदा

अधूरा करके सफ़र तुम अगर यूँ लौटोगे
तुम्हें करेगी बराबर थकान शर्मिंदा

शिकारी लोगों से कह दो न काटे पर कोई
फ़लक की गोद में होगी उड़ान शर्मिंदा

न जाने कितने ही बच्चों को छत नहीं मिलती
मगर कहाँ है किसी का मकान शर्मिंदा

मिला के हाथ जो रिश्वत की बात कर लेंगे
भला वो कैसे रखेंगे ईमान शर्मिंदा

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ग़ज़ल- 05

हमारी ज़िंदगी कोई फ़साना छोड़ देती है
यहाँ फिर लौट आने का बहाना छोड़ देती है

नहीं चूड़ी, नहीं कंगन, नहीं सिन्दूर है घर में
मगर औरत कभी क्या मुस्कुराना छोड़ देती है!

खड़ी दीवार होती है दिलों के दरमियां जब भी
मुहब्बत नफ़रतों का इक ज़माना छोड़ देती है

अँधेरा लौट आता है मेरी छत पर तेरी छत पर
दिये की लौ जो बाती को जलाना छोड़ देती है

बहुत बदनामियाँ होंगी यही तो सोचकर लड़की
किसी से दिल लगाकर, दिल लगाना छोड़ देती है

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ग़ज़ल- 06

किसी के काम न आएगी, हिचकिचाती है
नयी सदी है, हुकूमत से काँप जाती है

बताओ कैसे बदन से उतार कर फेकूँ
मेरी कमीज़ पुरानी उसे लुभाती है

खुली रखो नहीं खिड़की यूँ तेज़ आँधी में
यहाँ हवा से ये खिड़की भी चोट खाती है

फ़लक से चाँद सितारों से इश्क़ है तुमको
हमें वतन की ये मिट्टी भी ख़ूब भाती है

कि उससे पूछिएगा ज़िंदगी के बारे में
ग़रीबी-भूख जिसे उम्र भर सताती है

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ग़ज़ल- 07

दिलो-दिमाग़ वो अक्सर समझ नहीं पाया
किसी के प्यार को पत्थर समझ नहीं पाया

कि उसकी नींद भी टूटी यहाँ अचानक से
अधूरा ख़्वाब था, बिस्तर समझ नहीं पाया

ज़मीं के वास्ते सूरज-सितारे पागल हैं
कभी तुम्हारा ये अम्बर समझ नहीं पाया

चलो हटो कि नदी पास फिर बुलाएगी
ज़रा-सी प्यास समुंदर समझ नहीं पाया

न कोई तुमसे शिकायत, न ही ज़माने से
मेरा वजूद, मेरा घर समझ नहीं पाया

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ग़ज़ल- 08

उसे बदनामियों का ग़म नहीं है
जो अपनी बात पर क़ायम नहीं है

मैं कुर्सी छोड़ दूँगा अब किसी दिन
ये दुश्मन है मेरी, हमदम नहीं है

कभी उस पार जाकर क्या करूँगा
कहीं सिस्टम कोई सिस्टम नहीं है

बिछी है धूप की चादर यहाँ भी
यहाँ भी घास पर शबनम नहीं है

तुम्हारे पाँव में काँटे चुभे हैं
मेरा भी हाथ घायल कम नहीं है

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ग़ज़ल- 09

सही-ग़लत का नतीजा निकल के आता है
करो न फ़िक्र, अचानक से चल के आता है

किसी को भीख यूँ देने की ये अदा कैसी
तुम्हारे हाथ से सिक्का उछल के आता है

अँधेरा ख़ौफ़ में रहता है रातभर हमसे
हमारे नाम का दीपक जो जल के आता है

उसे भी शौक़ है मिल जाए अब ख़ुदा उसको
जो बासी बाँट के रोटी मचल के आता है

वफ़ा करो यहाँ दिल से वफ़ा न पाओगे
अभी तो इश्क़ भी मौसम में ढल के आता है

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ग़ज़ल- 10

उल्टे सीधे बयान से नफ़रत
है तुम्हारी ज़ुबान से नफ़रत

उसको नफ़रत है उसकी घण्टी से
उसको उसकी अज़ान से नफ़रत

कोई करता नहीं ज़माने में
रोटी, कपड़ा, मकान से नफ़रत

इक परिंदा कि टूटकर बोला
है ज़मीं-आसमान से नफ़रत

उम्र भर वो सफ़र में रह लेगा
जिसको होगी थकान से नफ़रत

3 Total Review

वसंत जमशेदपुरी

30 January 2026

बेहतरीन गजलें

A

Anil Verma

30 January 2026

लाजवाब ग़ज़लें!

A

Atul kumar

30 January 2026

बहुत उम्दा ग़ज़लें

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रचनाकार परिचय

विकास

ईमेल : bikashmunger676@gmail.com

निवास : मुंगेर (बिहार)

जन्मतिथि- 31 दिसम्बर, 1978
शिक्षा- स्नातक (विधि)
सम्प्रति- सदस्य, स्थायी लोक अदालत, भागलपुर (बिहार)
प्रकशित कृतियाँ- 'उछालो यूँ नहीं पत्थर', 'अभी दीवार गिरने दो' एवं 'सभी लगते हैं मुझको एक जैसे' (ग़ज़ल संग्रह)
सम्पादित कृति- ग़ज़लें बिहार की
समवेत संकलन- हिंदी ग़ज़ल के युवा चेहरे, हिंदी ग़ज़ल का बदलता मिज़ाज, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, दोहे के सौ रंग, ग़ज़ल त्रयोदश, यह समय कुछ खल रहा है, ग़ज़ल पंच शतक आदि संकलनों सहित दर्जनभर ग़ज़ल-आलोचना की पुस्तकों में रचनाएँ उद्धृत।
प्रसारण- आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से रचनाओं का नियमित प्रसारण
सम्पर्क- गुलज़ार पोखर, मुंगेर (बिहार)- 811201
मोबाइल- 9934224359