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सीमा सिंह की लघुकथाएँ

सीमा सिंह की लघुकथाएँ

सीमा सिंह लघुकथा विधा की सिद्धहस्त रचनाकार हैं। सुगढ़ कहन के साथ इनकी लघुकथाओं का कथ्य बिलकुल ज़मीनी और हमारे आसपास का है। इनकी प्रस्तुत लघुकथाओं में देखा जा सकता है कि ये छोटी-छोटी कहानियाँ ऐसी हैं, जैसे हमारे आसपास की रोज़ घटित होती घटनाएँ। ऐसी घटनाएँ, जिन की ओर शायद ही हमारा अधिक ध्यान जाता हो। लेकिन रचनाकार की परिपक्वता ही है कि उन नियमित घटनाओं में भी वे ऐसे सबक़ हमारे सामने रखती हैं, जो जीवन जीने का एक सलीक़ा सौंप देते हैं हमें। मार्मिकता इनकी कथाओं का मज़बूत पक्ष है, तो सूक्ष्म अन्वेषण की क्षमता उनका आधार।

- के० पी० अनमोल

पुनर्नवा

“चलो भैया, घर नहीं चलना है क्या?”
साथी के स्वर से सोच में डूबा मदन चौंककर बोला, “हाँ हाँ, चलो भाई निकलते हैं।”
सब अपनी-अपनी साईकिल लेकर बढ़ चले, तो साथ ही काम करने वाला राघव अपनी साईकिल मदन के आगे लगाकर बोला, “चलिए दद्दा, हम भी चलते हैं।”
“जिनसे नाता था वो तो कब का छोड़ गये, तू कौनसे जन्म रिश्ता निभा रहा है, रे?” असमय बुढाए हुए मदन ने साईकिल पर बैठते हुए कहा।
साईकिल बढ़ाते हुए राघव बोला, "दद्दा, उम्र में छोटा हूँ, आपसे कहने का हक तो नहीं है। मगर... "
"पता है तू क्या कहेगा, मगर मैं रातों को जागता रहता हूँ। दो घूँट गले के नीचे उतार कर ही अपना दर्द भूल पाता हूँ।"
"जानता हूँ, आपके साथ बहुत बुरा हुआ। वो मनहूस दिन भूलता ही नहीं है। तेज़ रफ्तार गाड़ी आई और आपकी दुनिया उजाड़ गयी। न जाने किस घड़ी में भौजी बच्चों को लेकर निकली थी घर से।"
"तू नहीं जानता, घर जाता हूँ तो अब भी उन तीनों की लाशें दिखाई देती हैं मुझे।"
"लेकिन दद्दा मैं..." राघव ने कहना चाहा, पर उसकी बात बीच ने ही काट मदन बोला- "अब तू निकल! बहुरिया राह देखती होगी, यहाँ से तो मैं पैदल चला जाऊँगा।"

"नहीं, दद्दा मैं आपका सामान दिलाकर, आपको घर पहुँचाकर ही जाऊँगा। बस आपका खाना बंधवा लेता हूँ।" ढाबा देख राघव ने कहा। खाना ले भी न पाया, तब तक मदन अपने लिए बोतल ले आया।
"सुनो दद्दा, तुमको हमारी क़सम है खाना खा ज़रूर लेना।"
उसने भी सिर हिला कर हामी भरी।

घर के क़रीब पहुँचे ही थे कि साईकिल डगमगा के रुक गयी। एक रोता हुआ, बदहवास बच्चा साईकिल से टकराकर गिर पड़ा था।
"अरे! ये बच्चा यहाँ इस सुनसान सड़क पर कहाँ से आ गया?"
"पता नहीं, जाने किसका बच्चा है! कैसे भटक कर यहाँ आ गया!" बच्चे के हाथ-पाँव सहलाते हुए मदन ने कहा। "अरे इसको मैं देखता हूँ, तुमको बहुत देर हो गई है, तुम अब जाओ।"
पर अगले ही पल जैसे याद आया, तो बच्चे के सर पर स्नेह से हाथ फिराते हुए बोला- "हाँ, ज़रा खाना पकड़ाते जाना।"

राघव अपने घर की ओर बढ़ा ही था कि साईकिल पर टंगे थैले के टकराने से ‘टन’ की आवाज़ हुई। आज पहली बार बोतल साईकिल पर ही टंगी छूट गयी थी।

 

 

वैशल्य

“बी०ए० तो मैं हरगिज़ नहीं करूँगी!"
यह आवाज़ कानों में पड़ी तो निर्मला की नींद टूटी। सर्दियों की अलसाई-सी सुबह, कुछ सफर की थकान और कुछ मायके की निश्चिन्तता! सबका मिला-जुला प्रभाव कुछ ऐसा रहा कि निर्मला देर तक सोती रही थी।
“मैंने बता दिया न, समझ नही आ रहा तुझे?” अगली आवाज़ के साथ ही तन्द्रा भी टूट गई, ये स्वर उसकी भाभी का था।
बिस्तर से उठ वह आवाज़ की दिशा में बढ़ी तो भाभी देखते ही उठ खडी हुई,
“अरे जिज्जी! इतनी सर्दी में बिस्तर से क्यों निकल आयीं आप? आप इधर आ जाओ, यहाँ बैठ जाओ!”अपने बिस्तर की रजाई ठीक करके उसे बैठाती हुई भाभी, अपने स्वर में नरमी भरते हुए बोली।
“क्यों बिगड़ रही हो बिट्टी पर सुबह-सुबह?” निर्मला ने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा।
“क्या बताएँ जिज्जी, स्कूल के हर खेल-कूद में हिस्सा लिया इसने, हमने नहीं रोका। पर अब ज़िद पर अड़ी है कि सादा बी०ए० नहीं करेंगे, पी० एड कॉलेज जाएँगे!” भाभी ने गुस्से से भरकर बिट्टी की नक़ल उतारते हुए कहा।
“तो उसमें क्या हर्ज है?”
“मगर कॉलेज यहाँ थोड़े ही है, बाहर जाना होगा।”
“तो क्या हुआ, बबलू को भी तो भेजा है। इसको भी भेज देना।"
“नहीं भेज पाएँगे हम। आपके भैया कह रहे हैं, बी०ए० करना है तो करे नहीं तो हम ब्याह कर देंगे, जो करना है अपने घर जाकर करे!”
“अपने घर जाकर करे का क्या मतलब है भाभी? निर्मला के मन के छाले फूट गये थे। तुम बहुत अच्छा गाना गाती थीं, तुम बन गईं संगीतज्ञ? मुझे पेंटिंग का चाव था, मैं बन गयी चित्रकार?” मन के भीतर की टीस, आँखों में डबडबा आयी निर्मला के।
“पर जिज्जी…!”
“भाभी! एक ही जीवन मिलता है, जी लेने दो बच्ची को!”
तभी बरामदे से एक पुरुष स्वर उभरा:
“बिट्टी! भर ले अपना फार्म बेटा! दफ्तर जाते वक़्त रजिस्ट्री करता जाऊँगा।”
अंदर के कमरे में, कोने में चुपचाप अपनी रजाई में दुबकी बूढ़ी अम्मा ने गहरी साँस ली। उसकी छाती पर से बरसों से रखा पत्थर हट गया था, वह स्वयं को फूल-सा हल्का महसूस कर रही थी।

 

 

ज़ेवर

"अरे लड़कियो, जल्दी से भीतर आओ बड़ी मालकिन बुला रही हैं।" हवेली की बुजुर्ग नौकरानी ने आँगन में गा-बजा रही लड़कियों को पुकारा तो सब उत्साहित हो झट से चल पड़ीं। मालकिन की तो ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। आखिर इकलौते पोते की पसन्द को स्वीकारने के लिए उन्होंने अपने बहू-बेटे को मना जो लिया था। पर इसके लिए उन्होंने यह शर्त भी रखी थी कि विवाह उनके पारिवारिक रीति-रिवाज से होगा। भावी वधू के साथ-साथ घर की स्त्रियाँ भी चाव से गहने देखने लगीं।

"अरे! ये मांग टीका अब कौन पहनता है?" होने वाली बहू की छोटी बहन ने हाथ में उठाकर बहन को सवालिया नज़रों से देखा।
"हमारी संस्कृति में हर गहने का अपना महत्व होता है बेटा!" कहते हुए मालकिन मांग टीका बहू की मांग में सजाकर मुस्कुराने लगी। अभी तक इधर-उधर ठिठोली कर रही लड़कियाँ शांत होकर, सुनने के लिए मालकिन के क़रीब सिमट आयीं।

"ये मांग टीका देख रही हो? नववधू को ये अहसास दिलाने के लिए पहनाया जाता है कि अब से उसके सिर पर एक नहीं, दो कुलों के सम्मान को निभाने की ज़िम्मेदारी है।"
"अरे बाप रे, इतनी भारी! इस नथ से तो नाक ही दुःख जाएगी भाभी की।" अपनी नाक की कील में नथ लटका कर उससे वजन का अंदाज़ा करती, वर की बहन की सहेली बोल पड़ी तो सब खिलखिला पड़े।
"नहीं नहीं बेटा, ये नाक की दुखन भी तो एक संकेत है बहू के लिए कि वो कोई भी ऐसा काम न करे, जिससे दो कुलों की नाक पर कोई बात आए।"
"चूड़ियों का भी बताइये?" पीछे खड़ी छोटी मालकिन ने घूँघट में से धीरे से कहा।
"हाँ छोटी, हर दम खनकती चूड़ियाँ ये एहसास करवाती हैं कि तुम जो कहती हो, करती हो, तुम जानो या न जानो पर उसकी प्रतिध्वनि दूर तक जाती है।"
"और ये पैरों की उँगलियों को बींधने वाले बिछुए माँ जी? इनका भी कुछ होता है?" सबसे पीछे खड़ी कौतूहल से सब देखती सुनती घर की धोबन आँखों में अचंभा भर पूछ ही बैठी।
"ये... ये तो बहुत महत्व रखतें हैं, हर पग बढ़ाने से पहले याद दिलातें है कि तुम किसी की पत्नी, किसी कुल की वधु हो और तुम्हारा हर उठता बढ़ता क़दम और उसका परिणाम, उन सब पर भी प्रभाव अवश्य डालेगा।"

"गहना का मतलब यह सब होता है अम्मा?" पीछे बैठ; देर से चुपचाप सबकी बात सुन रही, नौकरानी की लड़की ने अपनी माँ की कान में फुसफुसा कर पूछा।
"हमारे लिए तो बुरे बखत के साथी होते हैं, बस्स।" नौकरानी ने साड़ियाँ तह करते हुए कहा।

 

 

ज़ुराबें

“मेरे मोज़े में छेद निकल आया, कितने दिन से बता रहा हूँ! किसी को इतनी फुर्सत नहीं मिल रही कि ज़रा-सा सुई से ठीक कर दे।” ऑफिस के लिए तैयार होते समय जूते पहनते हुए हाथ में मोज़ा उठाया ही था कि छेद वैसा का वैसा ही देखकर आपे से बाहर होकर मोहन बाबू ने मोज़े बाहर फेंक दिये।
मन्दिर से वापस आती पत्नी ने पति का स्वर सुना तो तेज़ क़दमों से सीधे कमरें में जा पहुँची।

“अरे! कल सब लोग सगाई में चले गये थे, याद नहीं रहा। दूसरे मोज़े देती हूँ इतना शोर क्यों मचा रहे हो, सब सो रहे हैं!”
पत्नी के स्वर की तल्खी मोहन बाबू को और खल गयी, “दूसरे, तीसरे, और चौथे सब यहीं पड़ें हैं!” हाथ से इशारा कर फर्श पर बिखरे गंदे मोज़े की ढेरी की और पत्नी का ध्यान दिलाया।

“रुको, मैं बहु से माँग लाती हूँ, बेटे के मोज़े धुले होंगे।” पत्नी के स्वर की सहजता मोहन बाबू के लिए असह्य हो रही थी।
मोज़े लेकर पत्नी की जगह बहू आयी और साथ में सामान की सूची भी आगे बढ़ाते हुए बोली, “पापा जी, ये राशन का सामान आना है, वापसी में लेते आइएगा!”
मोहन बाबू ने सिर्फ़ ने मोज़े पकड़े तो बहू ने सूची उनके पास टिका दी और बड़ी बेपरवाही से फर्श पर पड़े उनके गंदे मोज़े को पैरों से कुचलती हुई कमरे से बहर निकल गयी।

अपने ऑफिस-बैग में सामान ठीक कर ही रहे थे कि छोटा बेटा लगभग दौड़ता हुआ कमरे में आया, “थैंक गॉड पापा, आप अभी निकले नहीं है, ज़रा इस फॉर्म पर साइन कर दीजिए प्लीज़!”
एक उचटती-सी नज़र हाथ में पकड़े फॉर्म और बेटे के चेहरे पर डालते हुए मोहन बाबू ने पूछा, “क्या है ये?”
“परमिशन फॉर्म है, आज लास्ट डेट है सम्मिट करने की, आप यहाँ पर साइन कर दीजिए।”
“पर परमिशन किस चीज़ की, पता तो चले!”
“स्कूल से गोवा टूर जा रहा है, फादर के साइन और उनका ही चेक लगाना होगा पेमेंट के लिए।” बेटे का स्वर किसी कुशल शास्त्रीय गायक की भांति सभी उतार-चढ़ाव बाद भी बेहद मधुर बना हुआ था।
“शाम को बात करते हैं इस पर!” बेहद ठंडे और संयत स्वर में बोलते हुए मोहन बाबू नाश्तें की मेज़ पर आकर बैठ गये थे। तभी अमरबेल-सी लहराती- लचकती उनकी लाडली बेटी पीछे से आकर गले में झूल गयी, “पापा, मुझे पाँच हज़ार रुपए चाहिए पापा!”
मोहन बाबू के मन में उठती स्नेह की नदी जैसे अचानक गर्म तपते पत्थर पर गिर गयी। भावनाओं के उद्वेग को सम्भालते हुए उन्होंने बेटी से पूछा,
“तुम्हारी पॉकेट मनी तो फिक्स है न?”
“पापा, कॉलेज की कैंटीन महँगी है न!”
“अभी कैश नहीं हैं मेरे पास, शाम को बात करते हैं।”

बिना नाश्ता किए अपना बैग उठा, तेज़-तेज़ कदमों से गाड़ी की ओर बढ़ते हुए, जेब से मोबाईल फोन निकालकर कान में लगाया, उधर से हैलो सुनते ही कहा,
“जी सर, अगर प्रमोशन के लिए ट्रांसफर आवश्यक है तब भी ज्वाइन कर लूँगा! आप देख लीजिए, जहाँ भी पोस्ट ख़ाली हो, मैं जाने को तैयार हूँ। मेरा परिवार मेरे बिना रह सकता है।”

 

 

मटर के दाने

“मिल गया प्रवेश पत्र बेटा?” मानसी की आहट सुन; ज़मीन पर सब्जी फैलाए बैठी माँ ने आवाज़ लगाकर पूछा।
“हाँ माँ।” संक्षिप्त-सा उत्तर दे, जग में से गिलास में पानी उड़ेलकर मानसी भी कुर्सी खिसकाकर रसोईघर के सामने ही माँ के पास बैठ गयी।
“आज फिर बिजलीघर के पीछे से सब्जियाँ लेकर आयी हो?” माँ को सब्जियाँ साफ करने में व्यस्त देख, मानसी ने पूछा।
“हाँ, बिजली का बिल जमा करने गई थी न! उधर से वापसी में आते समय लेती आई थी। दोपहर के बाद वहाँ थोड़ी सस्ती मिल जाती हैं न!”
“और सड़ी हुई भी !” मानसी ने झुककर पालक के साग की गली हुई टहनी हवा में घुमाई और कूड़े में फेंक दी।

पालक, गोभी, धनिया सब साफ कर कपड़े में लपेटकर रखती हुई माँ ने अब मटर की फलियाँ अपने पास सरकायीं और मानसी की ओर देखकर पूछा,
“तेरी क्लासेस कब तक चलेंगी?”
“अभी तो चल रही हैं माँ! अगले हफ्ते के बाद बंद होगीं।”
“अब कुछ और पैसे-वैसे तो नहीं जमा करने होंगे?” माँ के स्वर में चिंता झलक उठी।
“नहीं माँ, फ़िक्र मत कर, मैंने सोच-समझकर कॉलेज और विषय चुने थे।”

सिर झुकाकर मटर छाँटती माँ ने प्रतिउत्तर में गहरी साँस छोड़ी, जिसकी हवा से उसका अपना ही सफ़ेद सूना दामन थरथराया और फिर शांत हो, उसकी देह से चिपक गया। अब उसका सारा ध्यान मटर छाँटने में लगा था, जो थोड़ी-थोड़ी ख़राब हो रही थी। साफ़-साफ़ फलियाँ एक तरफ रख, सड़ी फलियों में से साफ़ दाने निकालने लगी।

“यह अच्छी भली मटर हैं तो माँ, इन्ही को क्यों नहीं बना लेती?” मानसी ने चुनकर ढेरी बनाई हुई साफ़-चमकीली फलियों की ओर देखते हुए, थोड़ा झुंझलाहट भरे स्वर में कहा।
“वो कल काम आ जाएगी और ये कल तक ख़राब हो जाएगी।” माँ ने साधारण स्वर में कहा।
उस एक पल में मानसी की आँखों के आगे माँ का हर वो समझौता, जो उसकी माँ ने पिता के बाद घर और परिवार के लिए किया था, किसी फिल्म के दृश्य-सा घूम गया।
मानसी ने माँ के हाथ से सब्जी लेते हुए कहा, “अब बस कर माँ! एक अच्छे कल का सपना देखने के लिए और कितने आज ख़राब करेगी अपने?”

 


दूध का जला

गुस्से से भुनभुनाते हुए अमरनाथ ने जैसे ही आँगन में क़दम रखा, सामने ही फर्श पर पड़े गिलास पर खीज उतारते हुए, उसे ज़ोर से ठोकर मारी। गिलास नाचता हुआ घर की नीरवता को झंकृत करता, दूसरे कोने में जा; दीवार से टकराकर शांत हो गया।

"दिखा ले जितना गुस्सा दिखाना है, मैं भी बाप हूँ तेरा! मन्नो की शादी वहीं होगी, जहाँ मैं हामी भरूँगा।” पिता अपने कमरे में से ही क्रोधित स्वर में डकराये।

घर की स्त्रियाँ समझ चुकी थीं कि हर बार की तरह इस बार भी अमरनाथ का पसन्द किया रिश्ता पिता को समझ में नहीं आया, और रिश्ता तय होने से पहले ही टूट गया है। क्योंकि यह पहली बार नहीं था, जब रिश्ता देखने गये पिता-पुत्र आपस मे उलझते हुए लौटे हों।

"पिता जी के कहे में रहे न, तब तो हो ली लड़की की शादी!” अमरनाथ क्रोध से भन्ना रहा था।

बीच-बचाव करने की गरज से माँ ने अमरनाथ के पास जाकर पूछा, “अरे, अब क्या हुआ, बेटा?”
बहू के हाथ से पानी का गिलास ले, बेटे को पकड़ाकर, उसके ही कंधे का सहारा ले बगल में बैठ गयी।

माँ को समर्थन में पाकर अमरनाथ फट पड़ा, “अच्छे खाते-पीते लोग हैं। लड़का डॉक्टर है। अब कुछ तो उम्मीद उन्होंने भी लगा रखी होगी ही न! वो लोग गाड़ी चाहते हैं, हमारा बजट पूछा। पिताजी को इतने भर से लालच दिख गया उनका!”
“अच्छा! तू चिंता न कर, अभी बात करती हूँ इनसे।” कहती हुई माँ ने पिताजी के कमरे का रुख़ किया, तो भीतर से आती बहू की आवाज़ सुन, ठिठकी।
“आप परेशान मत होइए बाबूजी! वो आपसे ऊपर थोड़े ही हैं!”
“पर बहू, कोई इनसे भी तो पूछो! आज के ज़माने में बिना लेन-देन के शादी मुमकिन है? फिर हम समर्थ हैं, तो क्यों न दें अपनी बिटिया को।” माँ ने उनकी बातचीत में शामिल होते हुए कहा।

“ये तुम कहती हो अमर की माँ? हमने अमिता की शादी में इन छोटी-छोटी बातों पर ही तो ध्यान नहीं दिया था।”
“पर एक बार ग़लत लोग मिल गये, तो ज़रूरी तो नहीं सब वैसे ही हों।” अपनी बेटी का ज़िक्र आते ही माँ का स्वर नम हो गया था।
"सुनो, अमर की माँ! हम अपनी बेटी को गवाँ चुके हैं, इसीलिए पोती के मामले में हर क़दम फूँक-फूँक कर रखना है!”

अपना निर्णय सुनाकर बाहर निकलकर, सामने ही खड़ी मन्नो के सिर पर हाथ फिराते हुए बोले, “अपने बाबा पर भरोसा रखना, तू उसी घर जाएगी, जहाँ तेरी ज़रूरत हो। तेरे पिता के ऊँचे ओहदे, और दादा की दौलत की नहीं।”

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रचनाकार परिचय

सीमा सिंह

ईमेल : libra.singhseema@gmail.com

निवास : ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 30 नवम्बर 1973 
जन्मस्थान- बदायूँ (उत्तर प्रदेश)
लेखन विधा- लघुकथा एवं कहानी
शिक्षा- स्नातकोत्तर – (हिंदी साहित्य, मनोविज्ञान।) 
संप्रति- महासचिव,शक्ति ब्रिगेड सामाजिक एवम् साहित्यिक संस्था, सदस्य, सम्पादक मंडल, लघुकथा कलश (अर्धवार्षिक पत्रिका) एवं स्वतंत्र लेखन 
प्रकाशन- • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-28 (छह नवोदिताओं की छियासठ कथाएँ), लघुकथा-अनवरत संकलन (साझा संकलन), नई सदी की धमक (साझा संकलन), स्त्री-पुरुष सम्बन्धी लघुकथाएँ (साझा संकलन), उद्गार (सांझा संकलन) सहित चालीस से अधिक साझा संकलनों में सम्मिलित।
• लघुकथा कलश पत्रिका, शोध-दिशा पत्रिका, दृष्टि पत्रिका, साहित्य अमृत पत्रिका, मृगमरीचिका पत्रिका, चेतना पत्रिका, मरु गुलशन के साथ ही पंजाबी पत्रिका गुसाइयाँ में अनुवाद सहित विभिन्न पत्रिकाओं में। • दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान,अमर उजाला, महानगर मेल, लोकजंग सांध्य दैनिक सहित विभिन्न समाचार पत्रों में। • yourstoryclub.com, openbooksonline.com, laghukatha.com, pratilipi.com वेबसाईट, तथा सेतु (Pittsburgh), हस्ताक्षर, अटूट बंधन सहित कई अन्य वेब पत्रिकाओं में
प्रसारण- बोल हरियाणा, रेडियो पर रवि यादव द्वारा लघुकथाओं का पाठ।
सम्मान/ पुरस्कार- कलश लघुकथा गौरव सम्मान - 2017
ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा - महादेवी वर्मा सम्मान - 2017 आशा किरण समृद्धि फाउंडेशन द्वारा - शिक्षा गौरव सम्मान - 2017
रोटरी क्लब इलीट द्वारा - हिंदी भाषा सेवा सम्मान - 2018
विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा - विद्या वाचस्पति सारस्वत सम्मान - 2018 रोटरी क्लब कानपुर इलीट द्वारा - वीमेन अचीवर सम्मान - 2019भारत उत्थान न्यास सम्मान - 2019
पुरस्कार: प्रतिलिपि कथा सम्मान प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2017
साहित्य सृजन संवाद कहानी प्रतियोगिता - विशिष्ट कहानी पुरस्कार - 2017
सेतु लघुकथा प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2018
संपर्क- रॉयल नेस्ट टेक ज़ोन -iv, ग्रेटर नोएडा गौतम बुद्ध नगर,(उत्तर प्रदेश)-201306
मोबाईल- 8948619547 / 7303311942