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रेत समाधि और गीतांजलि श्री- डॉ० शुभा श्रीवास्तव

रेत समाधि और गीतांजलि श्री- डॉ० शुभा श्रीवास्तव

"रेत समाधि अपने कथ्य और शिल्प में नवीन उपन्यास है| रेत समाधि में ऐसी स्त्री है जो हर स्त्री के अंदर छिपी हुई है| वह अपने आप में साधारण है परंतु अपनी प्रस्तुति में असाधारण है| उपन्यास में ऐसा संसार है जो परिचित है और अपने जादुई अंदाज में हमारे सामने आता है| रेत समाधि मौत के दरवाजे पर जिजीविषा की कथा को कहता है| रेत समाधि अपने औपन्यासिक शैली के लिए विशेष प्रसिद्ध रहा है|"


गीतांजलि श्री का जन्म 12 जून, 1957 ई० को हुआ था। गीतांजलि जी अपनी शैली के कारण विशेष प्रसिद्ध रही हैं। गीतांजलि श्री का कहना है कि मेरे विचार में, सृजन में सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक है कलाकार की ईमानदारी। जो लेखक-कलाकार अपने दिलो-दिमाग़ और अपनी आत्मा की आवाज़ के प्रति ईमानदार नहीं है, वह पाठकों का मनोरंजन तो कर सकता है पर उनके हृदय की गहराई तक नहीं पहुँच सकता। गीतांजलि जी का यह कथन उनकी ईमानदारी को ही प्रदर्शित नहीं करता बल्कि किसी भी साहित्य की उपादेयता की सबसे मूल कड़ी को प्रदर्शित करता है। उनका यह कथन उनकी लेखकीय ईमानदारी को प्रदर्शित करता है, जिसे उन्होंने अपनी रचनाओं में पिरोया ही नहीं है बल्कि पाठकों के समक्ष इस ईमानदारी को मज़बूती से प्रकट भी किया है। यह सच है कि पाठक सिर्फ मनोरंजन नहीं चाहता है बल्कि साहित्य का उद्देश्य अन्य भी है, जिसे गीतांजलि जी बहुत अच्छे से महसूस करती हैं और यही कारण रहा है कि उनकी रचनाओं में हमें उनकी सोच के अनुरूप विषय प्राप्त होता है। गीतांजलि की प्रसिद्धि का कारण भी संभवत यही है।

जीवन को फिर से जीने की ललक इनकी रचनाओं में देखी जा सकती है। देश के सीमाओं के बंटवारे मनुष्य के जीवन पर कितना फ़र्क डालते हैं, यह रोजी किन्नर के माध्यम से हम बड़ी आसानी से देख सकते हैं। वैसे गीतांजलि जी की यह बड़ी खासियत रही है कि वह अपने पात्रों के माध्यम से बड़ी आसानी से जीवन और उसके मर्म को उभार देती हैं। उनकी यह कला मुझे विशेष रूप से पसंद है। इनके उपन्यासों में सत्य है, घोर यथार्थ है, पर वह परत दर परत छिपा हुआ है। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि कहानी सुनाने की जो परंपरा है, गीतांजलि उसे तार-तार कर देती हैं और अपनी नवीनता के साथ कथा को उपस्थित करती हैं। 'तिरोहित' उपन्यास का कथानक बिल्कुल नए ढंग से घटता है और पाठक घटनाओं को पढ़ता जाता है, महसूस करता जाता है। उपन्यास के केंद्र में घटनाक्रम के बजाय चरित्र व पात्र तथा उनके आपसी रिश्तो की बारीकियाँ हैं। इन्हीं के माध्यम से कथा आगे बढ़ती है। जाहिर-सी बात है कि गीतांजलि जी ने और तराशी हुई भाषा का इस्तेमाल किया है। 'तिरोहित' उपन्यास में पात्रों की इच्छाएँ, वासना और ज़िंदगी के वादे अद्भुत गद्य शैली सामने आते हैं। बच्चों और लल्ला के अंतर्मन की व्यथा बड़े ख़ूबसूरत ढंग से व्यक्त की गई है। जीवन की परिस्थितियाँ, स्वयं का भोगा यथार्थ और समाज की वास्तविकता प्रकट करना ही उपन्यास का मुख्य ध्येय रहा है। इस उपन्यास में रोज़मर्रा की ज़िंदगी और उसके स्वाद की महक विद्यमान है।

'माई' उपन्यास में पारंपरिक स्त्री है, जो घरेलू जीवन का निर्वाह करती है परंतु बच्चे नए ज़माने के हैं। वे माई को ड्योढ़ी से बाहर की दुनिया दिखाना चाहते हैं। आज़ादी के बाद औपनिवेशिक मूल्यों के बीच मध्यवर्गीय जीवन उसके सुख-दुख की परत इस उपन्यास में बड़ी बा-ख़ूबी उभर कर आये है। इन सबके बीच एक औरत की ज़िंदगी का सच्चा चित्र खींचने में गीतांजलि जी सफल सिद्ध होती हैं। नई पीढ़ी की सोच रज्जू को उसके आदर्श को नहीं समझते हैं। इन्हीं सबके बीच कहानी का पूरा ताना-बाना बुनता रहता है।

'रेत समाधि' अपने कथ्य और शिल्प में नवीन उपन्यास है। 'रेत समाधि' में ऐसी स्त्री है, जो हर स्त्री के अंदर छिपी हुई है। वह अपने आप में साधारण है परंतु अपनी प्रस्तुति में असाधारण है। उपन्यास में ऐसा संसार है, जो परिचित है और अपने जादुई अंदाज़ में हमारे सामने आता है। 'रेत समाधि' मौत के दरवाज़े पर जिजीविषा की कथा को कहता है। रेत समाधि अपने औपन्यासिक शैली के लिए विशेष प्रसिद्ध रहा है।

भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पाकिस्तान की तरफ से हिंदू लड़कियों की लाशें थार के रेत समंदर में दफ्न की जाने लगीं शायद इसीलिए इस उपन्यास का नाम 'रेत समाधि' दिया गया है पर यह सिर्फ एक पक्ष को उद्घाटित करता है, समाधि के अनेक अर्थ हैं। मानवीय संवेदना के संदर्भ में भी उपन्यास बहुत कुछ कहता है। फ्लैशबैक से बचपन के प्रेम को याद करना कहन शैली में सौंदर्य उपस्थित करता है।

'रेत समाधि' एक कहानी है और उस कहानी के भीतर अनेक कहानियाँ गुँथे होने के बिना आभास कराए ही एक-दूसरे में समाहित हैं। पशु-पक्षियों की अपनी कहानी है, जो अपनी ज़ुबानी व्यक्त होते हैं। यह मुक्ति की भी कहानी है। कहानी के केंद्र में माँ का पुत्री और पुत्री का माँ बनने की प्रक्रिया के साथ ही माँ का प्रेमी से मिलने की आतुरता को देख पुत्री का उसके लिए प्रयास करना अपने आप में अनोखी कहानी कहता है। सबकुछ नष्ट हो जाने के बाद भी नई शुरुआत की संभावना इस उपन्यास का मुख्य बिंदु है। अम्मा और अनवर की कहानी राजनीतिक बिल्कुल नहीं है बल्कि मानवीय प्रेम की कहानी है, जिसमें एक-दूसरे को खो देने, ढूंढ न पाने की क्षमा याचना शामिल है।

उपन्यास में कई विरोधी तत्व एक साथ हैं। कहीं उत्श्रृंखला है तो कहीं परिपक्वता, कहीं कल्पना है तो कहीं यथार्थ, कहीं कहन शैली है तो कहीं शैली में मौन है। यहाँ विरोधी भाव एकमेव हैं। जैसे वृद्धावस्था और युवावस्था की मन:स्थिति, स्त्री और पुरुष के मनोविकार, संवेदनाएँ और मन का प्रेम, संयुक्त और एकल परिवार की स्थिति, भारत-पाकिस्तान विभाजन के मध्य मानवीय स्थिति, मनुष्य और जीव का अंतर्संबंध इत्यादि बिंदु पुस्तक में विचरण करते रहते हैं। कहते हैं कि बच्चे और बूढ़े एक समान होते हैं। अम्मा ने घर की देहरी को लांग कर अपने को बच्चा बना लिया था। अम्मा का यह रूप उपन्यास की केंद्रीय वस्तु है।
पाकिस्तान के चित्रण में मानवीयता के संदर्भ कथा घटना के साथ तरलता से बहते हैं। यहाँ पर विभाजन का क्रूर चित्रण नहीं है पर यथार्थ उपस्थित है। विभाजन में कमज़ोर वर्ग की त्रासदी इस उपन्यास में उभरकर सामने आई है। पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों का भागना, उनके साथ ज़बरदस्ती करना अपने आपको बचाने के लिए उनकी जद्दोजहद यह घटनाएँ संवेदनात्मक स्तर पर चित्रित हुए हैं। हिंदू लड़कियों को ज़बरदस्ती ट्रक में ले जाना, उन्हें बेचने के लिए कैदखाने और जानवरों के अस्तबल में रखना इत्यादि घटनाएँ स्त्री की पीड़ा को भीतर तक झकझोर देती हैं।

वर्तमान समय को विमर्शों का दौर कहना अतिशयोक्ति न होगा। इस उपन्यास को इस नज़रिए से देखा जाए तो रोजी के माध्यम से उपन्यास में थर्ड जेंडर विमर्श को देखा जा सकता है। वस्तुतः अम्मा और रोजी के बीच लैंगिक दायरे सरहद नहीं बना पाते हैं। यहाँ पर विमर्श का रूढ़ रूप नहीं है। पात्र अपने लिए स्वयं विमर्श खड़ा करते हैं। वह अम्मा के रूप में वृद्ध विमर्श हो या रोजी के माध्यम से किन्नर विमर्श हो या स्त्री पात्रों के माध्यम से स्त्री विमर्श हो। उपन्यास में विमर्श विस्तृत परिभाषा की माँग करते हैं। स्त्री चरित्र अपनी स्वतंत्र चेतना से लैस हैं, थर्ड जेंडर के रूप में रोजी एक सशक्त किरदार है और वृद्ध विमर्श के रूप में अम्मा भी एक सशक्त किरदार के रूप में उभरती हैं।

गीतांजली श्री ने उपन्यास में अम्मा के माध्यम से सभी स्त्रियों के मन के संसार को खोल दिया है। स्त्री के अंतर्मन की उड़ान चाहे वह नायिका हो या लेखिका की भरपूर दिखाई देती है। हर स्त्री के मन में अनेक आकांक्षाएँ हैं, जो अधूरी हैं। अनेक प्रेम भावनाएँ हैं, जो दबाकर रखी गई हैं। इस उपन्यास में स्त्री की जिजीविषा, प्रेम की चाहना, सरहदों की दूरियों को ना मानना यह सब संवेदना के खूबसूरत उच्च धरातल का निर्माण करता है। उस धरातल के साथ ही वह स्त्री यथार्थ देखना बंद नहीं करती हैं। स्त्री संदर्भ में वह कहती है कि हर माँ का एक बेटा होता है, जो उसे बताता है कि माँ तेरी बलि चढ़ी है परिवार की वेदी पर, औरत हर रंग जाति की इस कसौटी पर खरी उतरती है। इस उपन्यास में नारीवादी विचारधारा कौवा की पत्नी कवि के मुख से कराती हैं, यह मैं आप पर छोड़ती हूँ कि आप इसे नया प्रयोग कहेंगे या?

उपन्यास में गीतांजलि श्री का बोल्ड रुख भी देखने को मिलता है। उनकी शिव-पार्वती पर की गई टिप्पणियों ने कई हिंदूओं को आहत किया हैं, जिसके संदर्भ में याचिकाएँ दायर की गई हैं, जो समाचार पत्रों में देखी जा रही हैं। देश कोई भी हो, स्त्री का सच कभी नहीं बदलता है। स्त्री के संदर्भ में वह कहती हैं कि कट्टर तंत्र और शासन तंत्र को समाधियाँ रास नहीं आती, औरतों को खासकर वहीं उतार दो, जहाँ उनकी चमक मिट जाए, रंग फीकाता जाए, खाल झरती जाए, हड्डी गलती जाए, ख़ुशबू उड़ जाए। कट्टर ढक्कन खिसकाते नहीं क्योंकि ख़ुशबू का इतराना उन्हें स्वीकार नहीं।

उपन्यास में प्रतीकात्मकता भी बड़े खूबसूरत तरीके से रूपायित की गई है। अम्मा के संदर्भ में प्रतीकात्मकता रूप से सरहद की अपनी परिभाषा गढ़ी गई है। वह कहती हैं कि "हर अंग की अपनी सरहद होती है। दिल के बीच में सरहद खींच दोगे तो उसे बॉर्डर नहीं कहते, चोट कहते हैं।" उपन्यास में दर्शन के भी कहीं-कहीं बिंदु दिख जाते हैं, जब वह कहती हैं कि "मौत है तभी जीवन है" या फिर एक अन्य प्रसंग में "दुर्योधन भी सुयोधन का पल पा सकता है, रावण तो घोर प्रशंसा भी।"

उपन्यास में मध्यम वर्ग की बारीक से बारीक और सिलसिलेवार पकड़ गीतांजलि श्री की विशेषता को प्रकट करती है। मध्यवर्गीय जीवन में पति-पत्नी के बीच की खटपट, एकाकी परिवार, वृद्धों की स्थिति, संबंधों में रिक्तता इत्यादि अनेकानेक पक्ष इस उपन्यास में उभर करके आते हैं। उपन्यास में गालियों की भरमार है।
उपन्यास में कृष्णा सोबती, भीष्म साहनी, यशपाल आदि साहित्यकारों का भी समावेश दृष्टांत उपस्थित करता है। साथ ही गीतांजलि श्री के इन साहित्यकारों के गूढ़ अध्ययन को भी प्रकट करता है। उपन्यास में मंटो के किरदार हैं, कृष्णा सोबती की त्रासदी झेलती स्त्री है, मोहन राकेश के विभाजन की त्रासदी है और भीष्म साहनी के विभाजन की संवेदनाएँ भी शामिल हैं। किसी भी त्रासद घटना अख़बार में कैसे महज ख़बर के रूप में छपती है, इसका उदाहरण व्यंग्यात्मक न होते हुए भी व्यंग्य उपस्थित करता है। गीतांजलि श्री कहती हैं कि "ख़बर पश्तून में बुरी फँसी दो हिंदुस्तानी महिलाएँ"। गीतांजलि जी ने उपन्यास में एक ट्विस्ट भी दिया है कि जिस प्रेमी अनवर से मिलने वह जाती हैं, उसी प्रेमी के पुत्र के द्वारा उन्हें गोली मारी जाती है।

भाषा की दृष्टि से इस उपन्यास में वर्ण संकर भाषा बहुत प्रयोग की गई है। योजक चिन्ह का कहीं प्रयोग नहीं है। विभक्तियों की दृष्टि से भी यह उपन्यास अपनी अलग कहानी कहता है। व्यंग्य की छटा उपन्यास में सर्वत्र दिखाई देगी। एक उदाहरण दृष्टव्य है, "जिस भीड़ आंडू-पांडू से पूछो, जिस भी हिंदुस्तानी ज़बान में जवाब अंग्रेजी में देता है, वह भी ग़लत, अंग्रेजी में साइन बोर्ड पर हिंदी की भी वर्तनी ग़लत है, अंग्रेजी की तो माशा अल्लाह।"
शब्दों का अनूठा संसार इस उपन्यास की निजी विशेषता है। दैनिक बोलचाल के शब्द जैसे टपक-टपक, ताल-तलैया अपने अनुप्रासिक छंटा और नाद व्यंजनीय शोभा के साथ सुशोभित होते हैं। पिपियाती, लटालह, लिंगेमरमर, भकोस जैसे शब्द देशज गमक के साथ हिंदी में लुप्त होती लोक भाषा को जीवंत करते हैं। शब्दों की ध्वन्यात्मकता अपने सौंदर्यबोध के साथ उपस्थित है। उपन्यास में शब्द पाठक तक बेलौस और सपाट ढंग से पहुंचते हैं। यह बेलौस अभिव्यक्ति रेत समाधि की जीवंतता का पर्याय है। एक उदाहरण देना चाहूंगी गीतांजलि श्री कहती है कि "ए कॉव कॉव अपने घरों को मैला करो हमारे में क्यों घुसे हो गंदगी बजबजाने।" उपन्यास में शब्द अपने सामर्थ्य में हैं, उनकी सार्थकता वाक्यों में न होकर के भी है। यह शब्द ऐसे हैं कि वह वस्तुओं से भी बोली निकलवा दे रहे हैं, पशु-पक्षी की तो बात ही और है।

भाषा और शिल्प को विषयवस्तु के अनुरूप ढालने का गुण गीतांजलि जी को बा-ख़ूबी आता है। कहानी कहने की कला को सुरक्षित रखते हुए भी उन्होंने नयी भाषा का निर्माण किया है। गीतांजलि जी के शिल्प में बिंब की प्रधानता है पर यह बिंब कहीं से भी क्लिष्ट नहीं है बल्कि सहज व सामान्य है। भाषा की दृष्टि से अगर हम देखें तो इनकी भाषा परिवेश के अनुकूल और बोलचाल की साधारण भाषा है।

गीतांजलि जी का शिल्प भाषा में ऐसी ध्वनि उपस्थित करता है कि पाठक उस दुख, उस पीड़ा से ध्वन्यात्मक रूप से जुड़ जाता है। इसके साथ ही इनके कथा साहित्य में भाषा का प्रवाह ऐसा है कि लगता है कि हर पृष्ठ अपने आप में एक रंगमंच बन गया है। सबकुछ आँखों के सामने नाटक रूप में घटित हो रहा है जबकि सत्य है कि हम पढ़ रहे हैं, देख नहीं रहे। कुछ जगहों पर मुहावरात्मक शैली में बातों को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने का गुण भी गीतांजलि जी में है। जैसे कि वह कहती है कि ‘आग में हाथ डालकर आग को नहीं पहचाना जाता है।’

अपने इन वैशिष्ट्य के साथ बुकर पुरस्कार के माध्यम से हिंदी को वैश्विक धरातल पर लाने का श्रेय 'रेत समाधि' को जाता है। अपने व्यापक वैशिष्ट्य के कारण हिंदी साहित्य के इतिहास में यह उपन्यास स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा।

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रचनाकार परिचय

शुभा श्रीवास्तव

ईमेल : shubha.srivastava12@gmail.com

निवास : वाराणसी (उत्तरप्रदेश)

शिक्षा- एम०ए०, बी०एड, पी०एचडी, नेट
सम्प्रति- प्रवक्ता, राजकीय क्वींस कॉलेज, वाराणसी (उत्तरप्रदेश)
प्रकाशन- असाध्य वीणा: एक मूल्यांकन (समालोचना), हिंदी शिक्षण (हिंदी व्याकरण), पाठक की लाठी (साझा कहानी संग्रह)
आजकल, पाखी, परिंदे, सोच-विचार, कथादेश, परिकथा, प्रेमचंद पथ, नागरी पत्रिका तथा दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान आदि पत्रों में कहानी, कविता, ग़ज़ल, और लेख प्रकाशित
पुरस्कार- माँ धंवंतरी देवी कथा साहित्य सम्मान, चित्रगुप्त सम्मान, लोक चेतना सम्मान, कथादेश लघु कथा प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार
निवास- वाराणसी (उत्तरप्रदेश)
मोबाइल- 9455392568