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जनवरी 2026 के अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

सुरजीत की कविताएँ

सुरजीत की कविताएँ

सुरजीत भारतीय मूल की प्रवासी साहित्यकार हैं। उनकी रचनाओं में जीवन साँस लेता है, लेकिन चुप्प- शांत-हौले-से। उनके सृजन में एक ठहराव है, एक जीवन-लय है, एकान्त की नीरवता है, नीरवता जीवन से भरी हुई। उनकी रचनाओं में स्मृतियाँ हैं, स्वाभिमान है और जंगल, पेड़, चिड़ियाँ आदि अनेक ज़रूरी तत्वों की मौजूदगी है। सबसे अहम है इनकी रचनाओं का सूफ़ियाना ढंग, जो शायद पंजाब प्रान्त की मिट्टी अथवा लोक- परिवेश से आता है। सुरजीत की कविताएँ जीवन में गूँथी हुई अपनी ही धुन की लयात्मक अभिव्यक्ति हैं।

- के० पी० अनमोल


न जाने क्यों

बहुत सरल लगता था कभी
चुम्बकीय मुस्कान से
मौसमों में रंग भर लेना

सहज ही
पलटकर
इठलाती हवा का
हाथ थाम लेना

गुनगुने शब्दों का
जादू बिखेर
उठते तूफ़ानों को
रोक लेना

बड़ा ही सरल लगता था
ज़िन्दगी के पास बैठ
छोटी-छोटी बातें करना
क़हक़हे मार हँसना
शिकायतें करना
रूठना और
मान जाना

बड़ा मुश्किल लगता है
अब
फ़लसफ़ों के द्वंद में से
ज़िन्दगी के अर्थों को खोजना

पता नहीं क्यों
बड़ा मुश्किल लगता है

***********


दहलीज़

पहली उम्र के
वे अहसास
वे विश्वास
वे चेहरे
वे रिश्ते
अभी भी चल रहे हैं
मेरे साथ-साथ

यादों के कुछ कँवल
अभी भी मन की झील में
तैर रहे हैं ज्यों के त्यों

सुन्दर-सलोने सपने
अभी भी पलकों के नीचे
अंकुरित हो रहे उसी तरह

तितलियों को पकड़ने की
उम्र के चाव
अभी भी मेरी हथेलियों पर
फुदक-फुदक कर नाच रहे हैं
इंद्रधनुष के सातों रंग
अभी भी मेरी आँखों में
खिलखिलाकर हँस रहे हैं

मेरे अंदर की चंचल-सी लड़की
अभी भी दो चोटियाँ किए
हाथ में किताबें थामे
कॉलेज में सखियों के संग
ज़िन्दगी के स्टेज पर
‘गिद्धा’ नाचने चली जाती है

हैरान हूँ कि
मनस्थल पर
कुछ भी नहीं बदला
पर आहिस्ता-आहिस्ता
शीशे में अपना अक्स
बे-पहचान हुआ जाता है।

***********


अब मैं मुक्त हूँ

वो जो
अहम की पीड़ाएँ लगती थीं
वो जो
अहंकर की बेटियाँ पैदा होती थीं
अब गर्भित ही नहीं होतीं

वो अंकुश
जो मेरे माथे में लगते
और मेरी हस्ती में धँस जाते थे

वो लोग
जो मुझे पैरों तले रौंद
आगे निकल जाते थे

वो दोस्त
जो महफ़िल में
मेरी हाज़री को नकार देते थे

वो मेहरबान
जो हर इल्ज़ाम
मेरे सर जड़ देते थे

मैंने उनके साथ इंसाफ़ कर दिया है
मैंने उन्हें माफ़ कर दिया है
अब मैं मुक्त हूँ।

***********


पैग़म्बर

वह पर्वत-चोटी पे खड़ा था
हाथ ऊपर की ओर फैलाए
शांत, स्थिर
गगन की ओर झाँकता

उजले पैरहनों में
वह पैग़म्बर की तरह था लग रहा

उसके सम्मुख
एक सर झुका
फिर दो
तीन, चार
सर झुकते गये
सरों का हुजूम-सा
एक सैलाब-सा फैल गया उसके सामने

वह जो
पर्वत-चोटी पे खड़ा था
शांत, सहज-चित्त
अम्बर की ओर ताकता

झुके हुए सरों के क़ाफ़िले को
वह सम्बोधित हो, पूछने लगा-
आप लोग
यूँ पीछे खड़े-खड़े ही क्यों जड़ हो गये?
आगे बढ़ें
मेरे बराबर आएँ
और अपने पाँव ज़मीं पर टिकाएँ
अब इस तरह महसूस करें
कि जैसे
तुमने अपने बाजुओं से
आसमान को छू लिया हो
और जैसे चारों दिशाओं से
तुम्हारा आलिंगन भर गया हो!

अपने चक्षुओं को नील-गगन में
तारों के संग जोड़ दें
अपने हृदय में करुणा भर लें
पर्यावरण में अपनी साँसों को महसूस करें
अपने तीसरे नेत्र को खुलने दें
तुम्हारे अंदर का इंसान
धीरे-धीरे जाग उठेगा
और फिर तुम
इन्द्रधनुष पर बैठ
दर्शक की भान्ति
अपनी ज़िन्दगी को देखना

आएँ, आगे तो बढ़ें
आप सभी पैग़म्बर हो
ज़रा आगे तो बढ़ें...!

***********


मेरे गुरुदेव

द्वार पर
किसके क़दमों की आहट है
मेरी दिशाओं के आगे
नए क्षितिज के
संदेश लेकर कौन आया है?

शत सूर्य की लौ लेकर
मेरी अंधेरी कोठरी में
दिया जगाने कौन आया है?

मेरी सुरति के तल पर
रमज़ों की दस्तक देकर
रूह को रौशन कराने कौन आया है?

धरा पर पिघली पड़ी
इस देही-माटी को
होने का अहसास दिलाने कौन आया है?

मेरे मन से
शंका की गहर
धीरे-धीरे मिट रही है
तेरी आने की ख़बर
मुझे मन्त्र-मुग्ध कर रही है

आवेश में आकर
कहीं उड़ ही न जाऊँ
अपनी हवाओं को
मैं बाँधकर रख रही हूँ

ख़ुशामदीद
ऐ मेरे गुरुदेव,
ख़ुशामदीद!

***********


रूपोश

एक प्रातःकाल
मेरी दोस्त रानी
जब घर से सैर को निकली
तो ओस की बूँदों ने
उसके पाँव धोये
पर्वत की ओर जाती पगडण्डी ने
उसको अपनी ओर आकर्षित किया
पक्षियों की चहचहाहट ने
उसके कानों के द्वार पर
मधुर दस्तक दी

शीतल हवा का हाथ थामे
वह जा पहुँची जंगल के अंदर
मंत्र-मुग्ध-सी
खो गयी उस पल में
रानी-
मेरी दोस्त!

पेड़ों ने उसे देख बाँहें फैलाईं
डाल-डाल पात-पात ने
उसे छू के कहा-
तुम जानती हो
हम भी रानी हैं!
लताओं ने कहा-
हम भी रानी हैं!
घास के तिनके-तिनके ने कहा-
हम रानी हैं
हम रानी हैं
हम रानी हैं!

अब माटी के कण-कण से
आवाज़ आने लगी-
हम भी रानी हैं
हम भी रानी हैं!

रूपोश रानी को लगा
जैसे वह
धरती से आकाश तक फैल चुकी थी

8 Total Review
N

Neeru Sharma

28 January 2026

Bahut Sundar Man ko halke halke choote hue Kavitaen .

N

Neeru Sharma

28 January 2026

Bahut Sundar Man ko halke halke choote hue Kavitaen .

G

Gagan Meet

28 January 2026

बहुत सुंदर कविताएं हैं। बधाई हो।

S

Surinderpreet ghania

28 January 2026

Punjab ke jn Manas ki batcheet hai j kavita. Congratulations, surjit bhain ji.

H

Harpal

28 January 2026

बहुत अच्छी कविता लिखते हैं सुरजीत जी। हिंदी अनुवाद भी बहुत अच्छा है। बहुत बधाई।

K

Karamjit kaur kalsi

28 January 2026

Vvvnice

S

Surjit Kaur

27 January 2026

ईरा जैसे वरिष्ठ मैगज़ीन में मेरी कविता को स्थान देने के लिए धन्यवाद! कविताएँ पसंद करने के लिए आपका धन्यवाद मंजुल जी 🙏❤️

M

Manjul Nigam

27 January 2026

शानदार कविताओं के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया सुरजीत जी 🌹🌹

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रचनाकार परिचय

सुरजीत

ईमेल : surjitk33@gmail

निवास : बरैंपटन (टोरांटो)

जन्मस्थान- नई दिल्ली
शिक्षा- एम० ए०, एम० फिल
संप्रति- अध्यापन एवं इंश्योरेंस ब्रोकर (कैनेडा)
लेखन विधाएँ- पंजाबी में कविता, कहानी, गद्य, आलोचना और अंग्रेज़ी से पंजाबी में अनुवाद।
प्रकाशित कृतियाँ- शिकस्त रंग, हे सखी, विस्माद, तेरी रंगशाला (काव्य संग्रह), पारले पुल (कहानी संग्रह), प्रवासी पंजाबी साहित्य- शब्द अते संवाद (आलोचना), ज़िंदगी इक हुनर (गद्य), पंजाबी में कई पुस्तकें प्रकाशित।
संपादित कृतियाँ- कूँजाँ, धरत प्राई अपने लोक, लैवेंडर
सम्मान/ पुरस्कार- भारत, कैलिफोर्निया और कैनेडा की कई पंजाबी साहित्य संस्थाओं तथा कैनेडा के कौंसलेट जनरल की ओर से सम्मानित।
विशेष- उनकी एक पुस्तक का अनुवाद Twin Flame पुस्तक के रूप में अंग्रेज़ी में हुआ है
उल्लेखनीय गतिविधियाँ- कैनेडा की पंजाबी और हिंदी संस्था की सदस्य, दिशा– एन एसोशिएशन ऑफ़ कैनेडीयन वुमैन की जनरल सैक्रेटरी, दा लिटरेरी रिफलैकशनज़ संस्था की को-डाइरेक्टर, वर्ल्ड पंजाबी कॉन्फ्रेंस की वाइस प्रेसिडेंट आदि।
वर्तमान निवास- बरैंपटन (टोरांटो)